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________________ ३, ३२४] सम्मत्तमग्गणाए बंध-सामित्तं [५०९ अप्पमत्तापुव्वकरणउवसमा बंधा । अपुव्वकरणुवसमद्धाए संखेज्जे भागे गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ ३१६ ॥ __ अप्रमत्त और अपूर्वकरण उपशमक बन्धक हैं। अपूर्वकरण उपशमकालके संख्यात बहुभाग जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ ३१६ ॥ सासगसम्मादिट्ठी मदिअण्णाणिभंगो ॥३१७॥ सम्मामिच्छाइट्टी असंजदभंगो ॥ सासादनसम्यग्दृष्टियोंकी प्ररूपणा मतिअज्ञानियोंके समान है ॥ ३१७ ॥ सम्यग्मिथ्यादृष्टियोंकी प्ररूपणा असंयतोंके समान है ॥ ३१८ ॥ मिच्छाइट्ठीणमभवसिद्धिय भंगो ॥ ३१९ ॥ मिध्यादृष्टि जीवोंकी प्ररूपणा अभव्यसिद्धिक जीवोंके समान है ॥ ३१९ ॥ सण्णियाणुवादेण सण्णीसु जाव तित्थयरे त्ति ओघभंगो ॥ ३२० ॥ संज्ञीमार्गणानुसार संज्ञी जीवोंमें तीर्थंकर प्रकृति तक प्रकृत प्ररूपणा ओघके समान है ॥ णवरि विसेसो सादावेदणीयस्स चक्खुदंसणिभंगो ॥ ३२१ ॥ विशेषता इतनी है कि सातावेदनीयकी प्ररूपणा चक्षुदर्शनियोंके समान है ॥ ३२१ ॥ असण्णीसु अभवसिद्धियभंगो ॥ ३२२ ॥ असंज्ञी जीवोंमें प्रकृत प्ररूपणा अभव्यसिद्धिक जीवोंके समान है ॥ ३२२ ॥ आहाराणुवादेण आहारएसु ओघं ॥३२३॥ अणाहारएसु कम्मइयभंगो ॥३२४॥ आहारमार्गणानुसार आहारक जीवोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥३२३॥ अनाहारकोंकी प्ररूपणा कार्मणकाययोगियोंके समान है ॥ ३२४ ॥ ॥ इस प्रकार बन्धस्वामित्वविचयानुगम समाप्त हुआ ॥ ३ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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