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________________ छक्खंडागमे बंध- सामित्त-विचओ [ ३, ३०९ असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिकरण उपशमक तक बन्धक हैं । अनिवृत्तिकरण उपशमककालके शेषके शेषमें संख्यात बहुभाग जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ ३०८ ॥ ५०८ ] लोभसंजणस्स को बंधो को अबंधो ? ।। ३०९ ॥ संज्वलन लोभका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ! ॥ ३०९ ॥ असंजदसम्मादिट्टि पहुडि जाव अणियट्टी उवसमा बंधा । अणियट्टिउवसमद्धाए चरिमसमयं गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ।। ३१० ॥ असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिकरण उपशमक तक बन्धक हैं । अनिवृत्तिकरण उपशमककालके अन्तिम समयमें जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है । बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं | हस्स-रदि-भय- दुगुंछाणं को बंधो को अबंधो १ ।। ३११ ॥ हास्य, रति, भय और जुगुप्साका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ! ॥ ३११॥ असंजद सम्माइट्ठिष्पहुडि जाव अपुव्यकरणउवसमा बंधा । अपुव्वकरणुवसमद्धाए चरिमसमयं गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ ३१२ ॥ असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अपूर्वकरण उपशमक तक बन्धक हैं । अपूर्वकरण उपशमकालके अन्तिम समयको प्राप्त होकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ देवगड़-पंचिंदियजादि - वेडब्बिय-तेजा - कम्मइयसरीर - समचउरससंठाण - वेउव्त्रियअंगो वंग-वण्ण-गंध-रस- फास-देवाणुपुच्ची -अगुरुअलहुअ-उवघाद - परघाद - उस्सास-पसत्थविहायगदि-तस - चादर- पज्जत्त- पत्ते यसरीर-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर - आदेज्ज - णिमिणं-तित्थयरणामाणं को बंधो को अबंधो ? ।। ३१३ ॥ देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, वैक्रियिक, तैजस व कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, देवानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण और तीर्थंकर नामकर्मका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ ३१३ ॥ असंजदसम्मादिट्टिप्पहुडि जाव अपुव्वकरण उवसमा बंधा । अपुव्वकरणुवसमद्धाए संखेज्जे भागे गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ।। ३१४ ॥ असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अपूर्वकरण उपशमक तक बन्धक हैं । अपूर्वकरण उपशमकालके संख्यात बहुभाग जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ||३१४॥ आहारसरीर-आहारसरीरअंगोवंगाणं को बंधो । को अबंध ।। ३१५ ।। आहारकशरीर और आहारकशरीरांगोपांगका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? | Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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