SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 627
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५०२] छक्खंडागमे बंध-सामित्त-विचओ [ ३, २५३ दसणाणुवादेण चक्खुदंसणि-अचक्खुदंसणीणमोघं णेदव्वं जाव तित्थयरे ति ॥ ___ दर्शनमार्गणानुसार चक्षुदर्शनी और अचक्षुदर्शनी जीवोंकी प्ररूपणा तीर्थंकर प्रकृति तक ओघके समान है, ऐसा जानना चाहिये ॥ २५३ ॥ णवरि विसेसो, सादावेदणीयस्स को बंधो को अबंधो ? ॥ २५४ ॥ इतनी विशेषता है कि सातावेदनीयका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ।। मिच्छाइटिप्पहुडि जाव खीणकसाय-वीयराय-छदुमत्था बंधा । एदे बंधा, अबंधा णत्थि ॥ २५५ ॥ मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय-वीतराग-छमस्थ तक बन्धक हैं। ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं ॥ २५५ ॥ ओहिदंसणी ओहिणाणि भंगो ॥२५६॥ केवलदंसणी केवलणाणि भंगो ॥२५७॥ अवधिदर्शनी जीवोंकी प्ररूपणा अवधिज्ञानियोंके समान है ॥२५६॥ केवलदर्शनियोंकी प्ररूपणा केवलज्ञानियोंके समान है ॥ २५७ ॥ लेस्साणुवादेण किण्हलेस्सिय-णीललेस्सिय-काउलेस्सियाणमसंजदभंगो ॥ २५८ ॥ लेश्यामार्गणानुसार कृष्ण लेश्यावाले, नील लेश्यावाले और कापोत लेश्यावाले जीवोंकी प्ररूपणा असंयतोंके समान है ॥ २५८ ॥ तेउलेस्सिय - पम्मलेसिएसु पंचणाणावरणीय - छदसणावरणीय - सादावेदणीय-चउसंजलण-पुरिसवेद-हस्स-रदि-भय-दुगुंछा-देवगइ-पंचिंदियजादि वेउव्विय-तेजा - कम्मइयसरीरसमचउरससंठाण - वेउव्वियसरीरअंगोवंग-वण्ण - गंध - रस-फास देवगइपाओग्गाणुपुवी-अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघादुस्सास पसत्थविहायगइ-तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुह-सुभगसुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-णिमिणुच्चागोद-पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंधो? ॥ २५९ ॥ तेज और पद्मलेश्यावाले जीवोंमें पांच ज्ञानावरणीय, छह दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, चार संज्वलन, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, वैक्रियिक, तैजस व कार्मण शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ २५९ ॥ मिच्छाइटिप्पहुडि जाव अप्पमत्तसंजदा बंधा। एदे बंधा, अबंधा णत्थि ॥२६॥ मिथ्यादृष्टि से लेकर अप्रमत्तसंयत तक बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं ॥ बेढाणी ओधं ॥ २६१ ॥ असादावेदणीयमोघं ॥ २६२ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy