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३, २५२ ]
संजम मग्गणाए बंध - सामित्तं
[ ५०१
असंजदेसु पंचणाणावरणीय छदंसणावरणीय-सादासाद-बार सकसाय- पुरिसवेद-हस्सरदि- अरदि-सोग-भय- दुर्गुच्छा - मणुसगइ - देवगइ-पंचिंदियजादि - ओरालिय - वेउब्विय-तेजाकम्मइयसरीर-समचउरससंठाण - ओरालिय- वेडव्वियअंगोवंग- वज्जरिसहसंघडण वण्ण-गंध-रसफास - मणुसगह- देवगड़पाओग्गाणुपुत्री - अगुरुअलहुअ- उवघाद - परवाद - उस्सास-पसत्थविहायगहतस - बादर - पज्जत - पत्ते यसरीर-थिराथिर- सुहासुह-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज- जसकित्ति - णिमिणुच्चागोद- पंचतराइयाणं को बंधो को अबंधो ? ।। २४५ ॥
असंयतोंमें पांच ज्ञानावरणीय, छह दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, असातावेदनीय, बारह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, मनुष्यगति, देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक, वैक्रियिक, तैजस व कार्मण ये चार शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, औदारिक व वैक्रियिक शरीरांगोपांग, वज्रर्षभसंहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, मनुष्यगति व देवगति प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुअलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशः कीर्ति, अयशःकीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है || २४५ ॥
मिच्छाइट्टि पहुडि जाव असंजद सम्मादिट्ठी बंधा । एदे बंधा अबंधा, णत्थि ॥ मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयत सम्यग्दृष्टि तक बन्धक हैं । ये बन्धक है, अबन्धक
नहीं हैं ॥ २४६ ॥
बेट्टाणी ओघं ।। २४७ ॥
द्विस्थानिक प्रकृतियोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २४७ ॥
एकट्टाणी ओघं ॥ २४८ ॥
एकस्थानिक प्रकृतियोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २४८ ॥ मस्सा- देवाउआ को बंधो को अबंधो १ ॥ २४९ ॥
मनुष्यायु और देवायुका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ २४९ ॥ मिच्छाट्ठी सासणसम्माट्ठी असंजदसम्माइट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक है, शेष अबन्धक हैं || २५० ॥
तित्थयरणामस्स को बंधो को अबंधो ? ।। २५१ ॥
तीर्थंकर नामकर्मका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? || २५१ ॥ असंजद सम्माट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ।। २५२ ।। असंयतसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ २५२ ॥
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