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५००] छक्खंडागमे बंध-सामित्त-विचओ
[ ३, २३९ सुहुमसांपराइयसुद्धिसंजदेसु-पंचणाणावरणीय-चउदंसणावरणीय सादावेदणीय-जसकित्ति-उच्चागोद-पंचतराइयाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ २३९ ॥
. सूक्ष्मसाम्परायिक-शुद्धिसंयतोंमें पांच ज्ञानावरणीय, चार दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, यशःकीर्ति, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥२३९॥
सुहुमसांपराइयउवसमा खवा बंधा । एदे बंधा, अबंधा णत्थि ॥ २४० ॥ सूक्ष्मसाम्परायिक उपशमक और क्षपक बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं ॥ जहाक्खाद-विहार-सुद्धिसंजदेसु सादावेदनीयस्स को बंधो को अबंधो ? ॥२४१॥ यथाख्यात-विहार-शुद्धिसंयतोंमें सातावेदनीयका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ।।
उवसंतकसाय-चीदराग-छदुमत्था खीणकसाय-चीयराग-छदुमत्था सजोगिकेवली बंधा । सजोगिकेवलिअद्धाए चरिमसमयं गंतूण [बंधो] वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ २४२ ॥
उपशान्तकषाय-वीतराग-छद्मस्थ, क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ और सयोगिकेवली बन्धक हैं । सयोगकेवलीकालके अन्तिम समयमें जाकर बिन्ध] व्युच्छिन्न होता है । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ २४२ ॥
संजदासंजदेसु पंचणाणावरणीय - छदंसणावरणीय-सादासाद-अट्ठकसाय-पुरिसवेदहस्स-रदि-अरदि-सोग-भय-दुगुंछा-देवाउ-देवगइ -पंचिंदियजादि-वेउव्विय-तेजा-कम्मइयसरीरसमचउरससंठाण-वेउब्वियसरीरअंगोवंग-वण्ण-गंध-रस-फास-देवगइ-पाओग्गाणुपुवी-अगुरुवलहुव-उवघाद-परघाद-उस्सास-पसत्थ विहायगइ -तस-चादर - पज्जत्त - पत्तेयसरीर-थिराथिर सुहासुह-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-अजसकित्ति-णिमिण-तित्थयरुच्चागोद-पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ २४३ ॥
संयतासंयतोंमें पांच ज्ञानावरणीय, छह दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, असातावेदनीय, आठकषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, देवायु, देवगति, पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, अयशःकीर्ति, निर्माण, तीर्थंकर, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ ३४३ ॥
संजदासंजदा बंधा । एदे बंधा, अबंधा णत्थि ॥ २४४ ॥ संयतासंयत बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं है ॥ २४४ ॥
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