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३, २३८] संजममग्गणाए बंध-सामित्तं
[ ४९९ परिहारसुद्धिसंजदेसु पंचणाणावरणीय-छदंसणावरणीय-सादावेदणीय-चदुसंजलणपुरिसवेद-हस्स-रदि-भय-दुगुंछा-देवगइ-पंचिंदियजादि-उब्विय तेजा-कम्मइयसरीर-समचउरससंठाणचेउब्वियसरीरंगोवंग-चण्ण-गंध-रस-फास-देवाणुपुब्धि - अगुरुअलहुअ - उवघाद-परघादुस्सास-पसत्थविहायगदि-तस-बादर-पज्जत्त - पत्तेयसरीर-थिर-सुह-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-णिमिण-तित्थयर-उच्चागोद-पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंधो? ॥ २३१ ॥
परिहारशुद्धिसंयतोंमें पांच ज्ञानावरणीय, छह दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, चार संज्वलन, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, देवगति, पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियिक, तैजस व कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, देवानुपूर्वी, अगुरुअलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, स, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, निर्माण, तीर्थंकर, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ २३१ ॥
पमत्त-अप्पमत्त संजदा बंधा । एदे बंधा, अबंधा णत्थि ॥ २३२ ॥ प्रमत्त और अप्रमत्त संयत बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं ॥ २३२ ॥
असादावेदणीय -अरदि-सोग-अथिर-असुह - अजसकित्तिणामाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ २३३॥
असातावेदनीय, अरति, शोक, अस्थिर, अशुभ और अयशःकीर्ति नामकर्मका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक हैं ? ॥ २३३ ॥
पमत्तसंजदा बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ २३४॥ प्रमत्तसंयत तक बन्धक है । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ २३४ ॥ देवाउअस्स को बंधो को अबंधो? ॥ २३५॥ देवायुका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ २३५ ॥
पमत्तसंजदा अप्पमत्तसंजदा बंधा । अप्पमत्तसंजदद्धाए संखेज्जे भागे गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ।। २३६ ॥
प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत बन्धक हैं । अप्रमत्तसंयतकालका संख्यात बहुभाग जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ २३६ ॥
आहारसरीर-आहारसरीरंगोवंगणामाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ २३७॥ आहारकशरीर और आहारकशरीरांगोपांग नामकर्मका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ अप्पमत्तसंजदा बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ।। २३८ ॥ अप्रमत्तसंयत बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ २३८ ॥
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