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________________ ४९६ ] छक्खंडागमे खुदाबंधो [ ३, २०७ पुपि - अगुरुअलहुअ-उववाद -परवाद - उस्सास-उज्जीव- दो विहायगइ - तस बादर - पज्जत्त - पत्तेयसरीर-थिराथिर - सुहासु ह - सुभग- दुभंग-सुस्सर दुस्सर-आदेज्ज - अणादेज्ज - जसकित्ति - अजसकित्तिणिमिणणीचुच्चागोद- पंचं तराइयाणं को बंधो को अबंधो ? ।। २०७ ।। ज्ञानमार्गणाके अनुसार मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी और विभंगज्ञानी जीवोंमें पांच ज्ञानावरणीय, नौ दर्शनावरणीय, साता व असाता वेदनीय, सोलह कषाय, आठ नोकषाय, तिर्यगायु, मनुष्यायु, देवायु, तिर्यग्गति, मनुष्यगति, देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक, वैक्रियिक, तैजस व कार्मण शरीर, पांच संस्थान, औदारिक व वैकियिक शरीरांगोपांग; पांच संहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, तिर्यग्गति, मनुष्यगति व देवगति प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परधात, उच्छ्वास, उद्योत, दो विहायोगतियां, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, दुर्भग, सुस्वर, दुस्वर, आदेय, अनादेय, यशः कीर्ति, अयशः कीर्ति, निर्माण, नीच व ऊंच गोत्र और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ २०७ ॥ मिच्छाइट्ठी सास सम्माइट्ठी बंधा । एदे बंधा अबंधा णत्थि ॥ २०८ ॥ मिथ्यादृष्टि और सासादन सम्यग्दृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं है ॥२०८॥ एक्कट्ठाणी ओघं ॥ २०९ ॥ एकस्थानिक प्रकृतियोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २०९ ॥ आभिणिबोहिय सुद-ओहिणाणीसु पंचणाणावरणीय - चउदंसणावरणीय - जसकित्तिउच्चा गोद - पंचं तराइयाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ २१० ॥ आभिनिबोधक, श्रुत और अवधिज्ञानी जीवों में पांच ज्ञानावरणीय, चार दर्शनावरणीय, यशः कीर्ति, उच्चगोत्र और पांच अन्तरायका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ! ॥ २९० ॥ असंजदसम्माइट्टि पहुडि जाव सुहुमसांपराइयउवसमा खवा बंधा। सुहुमसांपराइयअद्धाए चरिमसमयं गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ।। २११ ॥ असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर सूक्ष्मसाम्परायिक उपशमक व क्षपक तक बन्धक हैं । सूक्ष्मसाम्परायिककालके अन्तिम समयमें जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं | ाि य पयला य ओघं ।। २१२ ।। निद्रा और प्रचलाकी प्ररूपणा ओधके समान है ॥ २१२ ॥ सादादणीस को बंधो को अबंधो ? ।। २१३ ॥ सातावेदनीयका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ २९३ ॥ असजद सम्मादिट्टि पहुडि जाव खीणकसाय-वीदराग छदुमत्था बंधा । एदे बंधा, अधा पथि ।। २१४ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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