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________________ ३, २०६] णाणमग्गणाए बंध-सामित्तं [ ४९५ मिच्छाइटिप्पहुडि जाव अणियट्टी उबसमा खवा बंधा । एदे बंधा, अबंधा पत्थि ॥ १९९॥ मिथ्यादृष्टि से लेकर अनिवृत्तिकरण उपशमक व क्षपक तक बन्धक हैं। ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं ॥ १९९ ॥ बेट्टाणि जाव माणसंजलणे त्ति ओघं ॥ २० ॥ द्विस्थानिक प्रकृतियोंको लेकर संज्वलन मान तक ओघके समान प्ररूपणा है ॥२०॥ हस्स-रदि जाव तित्थयरे त्ति ओघं ॥ २०१॥ हास्य व रतिसे लेकर तीर्थंकर प्रकृति तक ओघके समान प्ररूपणा है ॥ २०१॥ लोभकसाईसु पंचणाणावरणीय-चउदंसणावरणीय - सादावेदणीय-जसकित्ति-उच्चागोद-पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ २०२ ॥ लोभकषायी जीवोंमें पांच ज्ञानावरणीय, चार दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, यशःकीर्ति, उच्चगोत्र और पांच अन्तरायका कौन बन्धक हैं और कौन अबन्धक है ? ॥ २०२ ॥ मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव सुहुमसांपराइयउवसमा खवा बंधा। एदे बंधा, अबंधा णत्थि ॥ २०३ ॥ मिथ्यादृष्टि से लेकर सूक्ष्मसाम्परायिक उपशमक व क्षपक तक बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं ॥ २०३ ॥ सेसं जाव तित्थयरे त्ति ओघं । २०४ ॥ तीर्थंकर प्रकृति तक शेष प्रकृतियोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २०४ ॥ अकसाईसु सादावेदणीयस्स को बंधो को अबंधो ? ॥ २०५॥ अकषायी जीवोंमें सातावेदनीयका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ २०५॥ उवसंतकसाय-चीदराग-छदुमत्था खीणकसाय-वीदराग-छदुमत्था सजोगिकेवली बंधा। सजोगिकेवलिअद्धाए चरिमसमयं गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा॥ उपशान्तकषाय-वीतराग-छद्मस्थ, क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ और सयोगकेवली बन्धक हैं । सयोगकेवलिकालके अन्तिम समयको जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है। ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ २०६॥ णाणाणुवादेण मदिअण्णाणि-सुदअण्णाणि-विभंगणाणीसु पंचणाणावरणीय-णवदंसणावरणीय-सादासाद-सोलसकसाय-अट्ठणोकसाय-तिरिक्खाउ-मणुसाउ- देवाउ-तिरिक्खगइमणुसगइ-देवगइ-पंचिंदियजादि-ओरालिय-चेउब्धिय-तेजा-कम्मइयसरीर -पंचसंठाण-ओरालियवेउब्बियसरीरअंगोवंग-पंचसंघडण-घण्ण-गंध-रस-फास-तिरिक्खगइ-मणुसगइ-देवगइपाओग्गाणु Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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