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________________ ४९२] छक्खंडागमे बंध-सामित्त-विचओ [ ३, १७२ द्विस्थानिक प्रकृतियोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १७१ ॥ विस्थानिक पदसे यहां मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थानोंमें बन्धकी योग्यतासे अवस्थित प्रकृतियोंको ग्रहण किया गया है । णिद्दा य पयला य ओघं ॥१७२ ॥ निद्रा और प्रचला प्रकृतियोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १७२ ॥ असादावेदणीयमोघं ॥ १७३ ॥ आसातावेदनीयकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १७३ ॥ एक्कट्ठाणी ओधं ॥ १७४॥ एकस्थानिक प्रकृतियोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १७४ ॥ एक मात्र मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें जो प्रकृतियां बन्धयोग्य होकर स्थित हैं उनकी एकस्थानिक संज्ञा है । उन एकस्थानिकोंकी प्ररूपणा ओघके समान जानना चाहिये । अपच्चक्खाणावरणीयमोघं ॥ १७५ ॥ अप्रत्याख्यानावरणीयकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १७५ ॥ पच्चक्खाणावरणीयमोघं ॥ १७६ ॥ प्रत्याख्यानावरणीयकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १७६ ॥ हस्स-रदि जाव तित्थयरे त्ति ओघं ॥ १७७ ॥ हास्य व रतिसे लेकर तीर्थंकर प्रकृति तक जो प्रकृतियां हैं इनकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १७७ ॥ ____अवगदवेदएसु पंचणाणावरणीय-चउदंसणावरणीय-जसकित्ति - उच्चागोद-पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ १७८ ॥ अपगतवेदियोंमें पांच ज्ञानावरणीय, चार दर्शनावरणीय, यशःकीर्ति, उच्चगोत्र और पांच अन्तरायका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ १७८ ॥ अणियट्टिप्पहुडि जाव सुहुमसांपराइयउवसमा खवा बंधा । सुहुम-सांपराइयसुद्धिसंजदद्धाए चरिमसमयं गंतूण बंधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥१७९।। अनिवृत्तिकरणसे लेकर सूक्ष्म-साम्परायिक उपशमक व क्षपक तक बन्धक हैं। सूक्ष्मसाम्परायिक-शुद्धिसंयतकालके अन्तिम समयमें जाकर बन्ध व्युच्छिन्न होता है। ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ १७९ ॥ सादावेदणीयस्स को अबंधो ? ॥ १८० ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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