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जगमगणाए बंध - सामित्तं
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मिथ्यादृष्टि, सासादन सम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और सयोगिकेवली हैं। बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं ॥ १४९ ॥
मिच्छत्त-उंसयवेद-तिरिक्खाउ - मणुसाउ-चदुजादि- हुंडसठाण - असंपत्तसेवट्टसंघडण - आदाब- थावर - सुहुम-अपज्जत्त-साहारणसरीरणामाणं को बंधो को अबंधो ? ।। १५० ।।
मिथ्यात्व, नपुंसकवेद, तिर्यगायु, मनुष्यायु, चार जातियां, हुण्डसंस्थान, असंप्राप्तासृपाटिकासंहनन, आताप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणशरीर नामकर्मका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ! ॥ १५० ॥
मिच्छाइट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ।। १५१ ।। मिध्यादृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ १५१ ॥
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देवगइ - वेउच्चियसरीर - वेउब्वियसरीर अंगोरंग - देवगइपाओग्गाणुपुव्वी - तित्थयरणामाण को बंधो को अबंधो ? ।। १५२ ।
देवगति, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी और तीर्थंकर नामकर्मका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ १५२ ॥
असजद सम्मादिट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा १५३ ॥ असंयतसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ १५३ ॥
Maratजोगीणं देवगईए भंगो ॥ १५४ ॥
वैक्रियिककाययोगियोंकी प्ररूपणा देवगतिके समान है ॥ १५४ ॥
व्यसिकाय जोगीणं देवगइभंगो ।। १५५ ।।
बैक्रियिकमिश्रकाययोगियोंकी प्ररूपणा देवगतिके समान है ॥ १५५ ॥
वरि विसेसो, बेट्ठाणियासु तिरिक्खाउअं णत्थि मणुस्साउअं णत्थि ।। १५६ ॥ विशेषता केवल इतनी है कि द्विस्थानिक प्रकृतियोंमें तिर्यग्गायु नहीं है और मनुष्यायु भी नहीं है ॥ १५६ ॥
आहारकायजोगि आहारमिस्सकायजोगीसु पंचणाणावरणीय छदंसणावरणीयसादासाद-चदुसंजलण- पुरिसवेद - हस्स - रदि - अरदि - सोग-भय- दुगुंछा - देवाउ - देवगइ - पंचिंदियजादि - उवि तेजा कम्मइयसरीर-समचउरससंठाण - वेउव्विय सरीरअंगोवंग-वण्ण-गंध-रस-फासदेवगtपाओग्गाणुपुत्री- अगुरुवल हुव-उवघाद- परघाद - उस्सास - पसत्थविहाय गइ - तस - बादरपज्जत्त- पत्ते यसरीर-थिराथिर - सुहासुह- सुभग- सुस्सर - आदेज्ज - जसकित्ति - अजसकित्ति - णिमिणतित्थयर - उच्चागोद- पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंध ? ।। ९५७ ।।
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