SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 613
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ छक्खंडागमे बंध - सामित्त- विचओ [ ३, १४४ विशेषता यह है कि सातावेदनीयकी प्ररूपणा मनोयोगियोंके समान है ॥ १४३ ॥ ओरालियमस्तकाय जोगीसु पंचणाणावरणीय - छदंसणावरणीय - असादावेदनीयबारसकसाय-पुरिसवेद-हस्स-रदि- अरदि-सोग-भय- दुगुंछा - पंचिंदियजादि - तेजा - कम्मइयसरीरसमचउरस संठाण-वण्ण-गंध-रस- फास- अंगुरुअलहुअ- उवघाद - परघाद उस्सास - पसत्थ विहाय गइतस - बादर - पज्जत - पत्ते यसरीर-थिराथिर - सुहासुह-सुभग- सुस्तर - आदेज्ज - जसकित्ति - णिमिणउच्चागोद - पंचतराइयाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ १४४ ॥ ४८८ ] औदारिकमिश्रकाययोगियोंमें पांच ज्ञानावरणीय, छह दर्शनावरणीय, असातावेदनीय, बारह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, पंचेन्द्रिय जाति, तैजस व कार्मण शरीर, समचतुरस्र संस्थान, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? || मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी असंजदसम्माइट्ठी बंधा । एदे बंधा अवसेसा अबंधा ।। १४५ ॥ मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ १४५ ॥ णिद्दाणिद्दा- पयलापयला-थीण गिद्धि - अनंताणुबंधिकोध-माण- माया-लोभ- इत्थि वेदतिरिक्खगइ-मणुसगइ ओरालिय सरीर - चउसठाण ओरालिय सरीर अंगोवंग-पंच संघडण -तिरिक्ख- मणुसंग पाओग्गाणुपुच्ची - उज्जोव - अप्पसत्थविहायगइ - दुभग दुस्सर - अणादेज्ज - णीचागोदाणं को बंधो को अबंधो ? ।। १४६ ॥ निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया व लोभ, स्त्रीवेद, तिर्यग्गति, मनुष्यगति, औदारिकशरीर, चार संस्थान, औदारिकशरीरांगोपांग, पांच संहनन, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उद्योत, अप्रशस्त बिहायोगति, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और नीचगोत्रका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ? ॥ १४६ ॥ मिच्छाइट्ठी सासणसम्माट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ।। १४७ ।। मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ १४७॥ सादावेदणीस को बंधो को अबंधो ? ।। १४८ ॥ 1 सातावेदनीयका कौन बन्धक है और कौन अबन्धक है ! ॥ १४८ ॥ मिच्छाडी सास सम्माहट्ठी असंजदसम्माइट्ठी सजोगिकेवली बंधा । एदे बंधा, अधा णत्थि ।। १४९ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy