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________________ ३, ७९] ओधेण बंध-सामित्तपरूवणा [ ४७९ सव्वे एदे बंधा, अबंधा णत्थि ॥ ७४ ॥ वे सब ही उनके बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं ॥ ७४ ॥ मणुसगदीए मणुस-मणुसपज्जत्त-मणुसिणीसु ओघं णेयव्वं जाव तित्थयरे ति । णवरि विसेसो, बेट्ठाणी अपच्चक्खाणावरणीयं जधा पंचिंदियतिरिक्खभंगो ॥ ७५ ॥ मनुष्यगतिमें मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त एवं मनुष्यनियोंमें तीर्थंकर प्रकृति तक ओधके समान जानना चाहिये । विशेषता इतनी है कि निद्रानिद्रा आदि द्विस्थानिक प्रकृतियों और अप्रत्याख्यानावरणीयचतुष्ककी प्ररूपणा पंचेन्द्रिय तिर्यंचोंके समान है ॥ ७५ ।।। मणुसअपज्जत्ताणं पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्तभंगो ॥ ७६ ॥ मनुष्य अपर्याप्तोंकी प्ररूपणा पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तोंके समान है ॥ ७६ ॥ देवगदीए देवेसु पंचणाणावरणीय-छदसणावरणीय-सादासाद-बारसकसाय-पुरिसवेदहस्स-रदि-अरदि-सोग-भय-दुगुंछा-मणुसगइ-पंचिंदियजादि-ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीर-समचउरससंठाण-ओरालियसरीरअंगोवंग-वज्जरिसहसंघडण-चण्ण-गंध-रस-फास-मणुसाणुपुव्विअगुरुअलहुव-उवघाद-परघाद-उस्सास-पसस्थविहायगदि-तस -बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिराथिर-सुहासुह-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-अजसकित्ति-णिमिण-उच्चागोद-पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंधो? ॥ ७७॥ देवगतिमें देवोंमें पांच ज्ञानावरणीय, छह दर्शनावरणीय, साता व असाता वेदनीय, बारह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, मनुष्यगति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक, तैजस व कार्मण शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, औदारिकशरीरांगोपांग, वज्रर्षभसंहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, अयशःकीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥७७॥ मिच्छाइटिप्पहुडि जाव असंजदसम्माइट्ठी बंधा । एदे बंधा, अबंधा णत्थि ॥७८॥ मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं ॥ णिद्दाणिद्दा-पयलापयला-थीणगिद्धि-अणंताणुबंधिकोध-माण - माया-लोभ-इत्थिवेदतिरिक्खाउ-तिरिक्खगइ-चउसंठाण-चउसंघडण-तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुश्वि-उज्जोव-अप्पसत्थविहायगइ-दुभग-दुस्सर-अणादेज्ज-णीचागोदाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ ७९ ॥ निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया व लोभ, स्त्रीवेद, तिर्यग्गायु, तिर्यग्गति, चार संस्थान, चार संहनन, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और नीचगोत्र; इनका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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