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________________ ४७८ ] छक्खंडागमे बंध-सामित्त-विचओ [३, ६८ . मिथ्यात्व, नपुंसकवेद, नारकायु, नरकगति, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय व चतुरिन्द्रिय जाति, हुण्डसंस्थान, असंप्राप्तासृपाटिकाशरीरसंहनन, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आताप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारणशरीर नामकर्मोंका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ ६७ ॥ मिच्छाइट्टी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ ६८॥ मिथ्यादृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष तिर्यंच अबन्धक हैं ॥ ६८॥ अपच्चक्खाणकोध-माण-माया-लोभाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ ६९ ॥ अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है। मिच्छाइटिप्पहुडि जाव असंजदसम्मादिट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ।। मिथ्यादृष्टि से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं । देवाउअस्स को बंधो को अबंधो १ ॥ ७१ ॥ देवायुका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ।। ७१ ॥ मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी असंजदसम्माइट्ठी संजदासंजदा बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ ७२ ॥ मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ ७२ ॥ पंचिंदियतिरिक्खअप्पज्जत्ता पंचणाणावरणीय-णवदंसणावरणीय-सादासाद-मिच्छत्तसोलसकषाय - णवणोकसाय-तिरिक्खाउ-मणुस्साउ -तिरिक्खगइ-मणुस्सगइ-एइंदिय-बीइंदियतीइंदिय-चउरिंदिय-पंचिंदियजादि-ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीर-छसंठाण-छसंघडण-ओरालियसरीरअंगोवंग-वण्ण-गंध-रस-फास-तिरिक्खगइ-मणुस्सगइप्पाओग्गाणुपुची - अगुरुवलहुवउवधाद-परघाद-उस्सास- आदावुज्जोव-दोविहायगइ-तस-थावर-बादर-सुहुम-पज्जत्त-अपज्जत्तपत्तेय-साहारणसरीर-थिराथिर-सुहासुह-सुभग-[दुभग-] सुस्सर-दुस्सर-आदेज्ज-अणादेज्जजसकित्ति-अजसकित्ति-णिमिण-णीचुच्चागोद-पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ ७३ ॥ पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तोंमें पांच ज्ञानावरणीय, नौ दर्शनावरणीय, साता व असता वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, नौ नोकषाय, तिर्यगायु, मनुष्यायु, तिर्यग्गति, मनुष्यगति, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय व पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक, तैजस व कार्मण शरीर, छह संस्थान, औदारिकशरीरांगोपांग, छह संहनन, वर्ग, गन्ध, रस, स्पर्श, तिर्यग्गति व मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, आताप, उद्योत, दो विहायोगतियां, त्रस, स्थावर, बादर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येकशरीर, साधारणशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, [दुर्भग,] सुस्वर, दुस्वर, आदेय, अनादेय, यश कीर्ति, अयश कीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र, उच्चगोत्र और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ ७३ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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