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________________ ३, ६७] . ओघेण बंध-सामित्तपरूपणा [ ४७७ सम्यमिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं। ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥६२॥ तिरिक्खगदीए तिरिक्खा पंचिंदियतिरिक्खा पंचिंदिय-तिरिक्खपज्जत्ता पंचिंदियतिरिक्खजोणिणीसु पंचणाणावरणीय-छदंसणावरणीय - सादासाद-अट्ठकसाय-पुरिसवेद-हस्सरदि-अरदि-सोग-भय-दुगुच्छा-देवगइ-पंचिंदियजादि-उब्विय-तेजा-कम्मइयसरीर-समचउरससंठाण-वेउब्वियसरीरअंगोवंग-वण्ण-गंध-रस-फास-देवगदिपाओग्गाणुपुवी-अगुरुलहुव-उवघादपरघाद-उस्सास-पसत्थविहायगइ-तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-[थिरा] थिर-सुहासुह-सुभगसुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-अजसकित्ति-णिमिण - उच्चागोद - पंचंतराइयाणं को बंधो को अबंधो? ॥ ६३॥ तिर्यंचगतिमें तिथंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त और पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमतियोंमें पांच ज्ञानावरणीय, छह दर्शनावरणीय, साता व असातावेदनीय, आठ कसाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, वैक्रियिक, तैजस व कार्मण शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुअलघु, उपघात, परघाद, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, अयशःकीर्ति, निर्माण, उच्चगौत्र, और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ ६३ ॥ मिच्छाइटिप्पहुडि जाव संजदासंजदा बंधा । एदे बंधा, अबंधा णत्थि ॥ ६४ ॥ मिथ्यादृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक बन्धक हैं। ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं है ॥६४॥ णिहाणिद्दा-पयलापयला- थीणगिद्धि-अणंताणुबंधि-कोध-माण-माया-लोभइत्थिवेद-तिरिक्खाउ-मणुसाउ-तिरिक्खगइ-मणुसगइ -ओरालियसरीर-चउसंठाण-ओरालिय-. सरीरअंगोवंग-पंचसंघडण-तिरिक्खगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुव्वि-उज्जोव-अप्पसत्थविहायगडदुभग-दुस्सर-अणादेज्ज-णीचागोदाणं को बंधो को अबंधो ? ॥६५॥ . निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया व लोभ, स्त्रीवेद, तिर्यगायु, मनुष्यायु, तिर्यगति, मनुष्यगति, औदारिकशरीर, चार संस्थान, औदारिकशरीरांगोपांग, पांच संहनन, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और नीचगोत्र; इनका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ ६५ ॥ मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥६६॥ मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥६६॥ मिच्छत्त-णqसयवेद-णिरयाउ-णिरयगइ-एइंदिय-बीइंदिय-तीइंदिय-चउरिंदियजादिहुंडसंठाण- असंपत्तसेवट्टसंघडण-णिरयगइपाओग्गाणुपुचि - आदाव -थावर-सुहुम -अपज्जत्तसाहारणसरीरणामाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ ६७ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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