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________________ ४७६] छक्खंडागमे बंध-सामित्त-विचओ [ ३, ५५ उबघाद-परघाद-उस्सास-पसत्थविहायगइ-तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिराथिर [सुहा] सुहसुभग सुस्सर-आदज्ज-जसकित्ति-अजसकित्ति-णिमिण-पंचतराइयाणं को बंधो को अबंधो॥ ___ सातवीं पृथिवीके नारकियोंमें पांच ज्ञानावरणीय, छह दर्शनावरणीय, साता व असाता वेदनीय, अप्रत्याख्यानावरण क्रोध आदि बारह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक, तैजस व कार्मण शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, औदारिकशरीरांगोपांग, वज्रर्षभसंहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, अयश कीर्ति, निर्माण और पांच अन्तराय; इनका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ ५५ ॥ मिच्छादिटिप्पहुडि जाव असंजदसम्मादिट्ठी बंधा । एदे बंधा, अबंधा णत्थि ॥ मिथ्यादृष्टि से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, अबन्धक नहीं हैं । णिद्दाणिदा-पयलापयला-थीणगिद्धि-अणंताणुबंधिकोह-माण-माया - लोभ इत्थिवेदतिरिक्खगइ-चउसंठाण-चउसंघडण-तिरिक्खगइपाओग्गाणुपुब्बी- उज्जोव - अप्पसत्थविहायगइदुभग-दुस्सर-अणादेज्ज-णीचागोदाणं को बंधो को अबंधो? ॥ ५७॥ __निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, रत्यानगृद्धि, अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया व लोभ, स्त्रीवेद, तिर्यग्गति, न्यग्रोधपरिमण्डल आदि चार संस्थान, वज्रनाराच आदि चार संहनन, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और नीचगोत्र; इन प्रकृतियोंका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ ५७ ॥ मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ ५८ ॥ मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ।। ५८॥ मिच्छत्त-णसयवेद-तिरिक्खाउ - हुंडसंठाण-असंपत्तसेवट्टसरीरसंघडणणामाणं को बधो को अबंधो? ॥ ५९॥ मिथ्यात्व, नपुंसकवेद, तिर्यगायु, हुण्डसंस्थान और असंप्राप्तासृपाटिकाशरीरसंहनन; इन प्रकृतियोंका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ ५९ ॥ मिच्छाइट्ठी बंधा । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥६० ॥ मिथ्यादृष्टि बन्धक हैं । ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ ६० ॥ मणुसगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुब्बी-उच्चागोदाणं को बंधो को अबंधो ? ॥ ६१ ॥ मनुष्यगति, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी और उच्चगोत्र प्रकृतियोंका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ ६१॥ सम्मामिच्छाइट्ठी असंजदसम्माइट्ठी बंधा ।' एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥ ६२ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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