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________________ ३, ४१] ओघेण बंध-सामित्त-विचओ [४७१ तित्थयरणामस्स को बधो को अबंधो ? ॥३७॥ तीर्थकर नामकर्मका कौन बन्धक और कौन अबन्धक है ? ॥ ३७॥ असंजदसम्माइटिप्पहुडि जाव अपुव्वकरणं-पइट्ठ-उवसमा खवा बंधा । अपुव्वकरणद्धाए संखेज्जे भागे गंतूण बधो वोच्छिज्जदि । एदे बंधा, अवसेसा अबंधा ॥३८॥ असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अपूर्वकरण-प्रविष्ट उपशमक और क्षपक तक बन्धक हैं। अपूर्वकरणकालके संख्यात बहुभागोंको बिताकर उसका बन्ध व्युच्छिन्न होता है। ये बन्धक हैं, शेष अबन्धक हैं ॥ ३८ ॥ अब यहां तीर्थंकर प्रकृतिके कारणोंके निरूपणाथ उत्तर सूत्र कहते हैंकदिहि कारणेहि जीवा तित्थयरणाम-गोदं कम्मं बंधति ? ॥ ३९॥ कितने कारणोंसे जीव तीर्थंकर नाम-गोत्र कर्मको बांधते हैं ? ॥ ३९ ॥ तीर्थंकर प्रकृतिका चूंकि उच्चगोत्रके साथ अविनाभाव पाया जाता है, इसीलिये उसे यहां 'गोत्र' नामसे भी कहा गया है। तत्थ इमेहि सोलसेहि कारणेहि जीवा तित्थयरणाम-गोदं कम्मं बंधंति ॥ ४० ॥ जीव वहां (मनुष्यगतिमें ) इन सोलह कारणोंसे तीर्थंकर नाम-गोत्र कर्मको बांधते हैं ॥ दंसणविसुज्झदाए विणयसंपण्णदाए सीलव्वदेसु निरदिचारदाए आवासएसु अपरिहीणदाए खण-लव-पडिबुज्झणदाए लद्धिसंवेगसंपण्णदाए यथाथामे तथातवे साहूणं पासुअपरिचागदाए साहूणं समाहिसंधारणाए साहूणं वेज्जावञ्चजोगजुत्तदाए अरहंतभत्तीए बहुसुदभत्तीए पवयणभत्तीए पवयणवच्छलदाए पवयणप्पभावणदाए अभिक्खणं अभिक्खणं गाणोवजोगजुत्तदाए, इच्चेदेहि सोलसेहि कारणेहि जीवा तित्थयरणाम-गोदं कम्मं बंधति॥४१॥ ___ दर्शनविशुद्धता, विनयसंपन्नता, शील-व्रतोमें निरतिचारिता, छह आवश्यकोंमें अपरिहीनता, क्षण-लवप्रतिबोधनता, लब्धिसंवेगसंपन्नता, यथाशक्ति-तथा-तप, साधुओंकी प्रासुकपरित्यागता, साधुओंकी समाधिसंधारणा, साधुओंकी वैयावृत्ययोगयुक्तता, अरहंतभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, प्रवचनवत्सलता, प्रवचनप्रभावना और अभीक्ष्ण-अभीक्ष्णज्ञानोपयोगयुक्तता; इन सोलह कारणोंसे जीव तीर्थकर नाम-गोत्रकर्मको बांधते हैं ॥ ४१ ॥ १. दर्शनसे अभिप्राय यहां सम्यग्दर्शनका है। तीन मूढता, आठ शंकादि दोष, छह अनायतन और आठ मद; इन पच्चीस दोषोंसे रहित निर्मल सम्यग्दर्शनका नाम दर्शनविशुद्धता है । २. विनय तीन प्रकारका है- ज्ञानविनय, दर्शनविनय और चारित्रविनय, इनमें बार बार ज्ञानके विषयमें उपयोगयुक्त रहना तथा बहुत श्रुतके ज्ञाता उपाध्यायादिकी व श्रुतकी भक्ति करना, इसका नाम ज्ञानविनय है । सर्वज्ञप्रतिपादित जीवादि तत्त्वोंका मूढतादि समस्त दोषोंसे Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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