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________________ . ४७२] छक्खंडागमे बंध-सामित्त-विचओ [ ३, ४१ रहित निर्मल श्रद्धान करना, यह दर्शनविनय है। निर्दोष शील-व्रतोंका परिपालन करते हुए आवश्यकोंकी हानि न होने देनेका नाम चारित्रविनय है । इस तीन प्रकारके विनयकी परिपूर्णता ही विनयसम्पन्नतां कही जाती है। . . ३. हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रह इन पापोंके परित्यागको व्रत तथा उन व्रतोंके रक्षणको शील कहा जाता है । मद्यपान करने, मांसभक्षण करने, एवं कषायादिका परित्याग न करनेको अतिचार कहते हैं । इन अतिचारोंसे रहित शील-व्रतोंका परिपालन करना, यह शीलवतेष्वनतिचारता (शील-व्रतोंमें अनतिचारता) कही जाती है। ४. समता, स्तव, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और व्युत्सर्ग ये; छह आवश्यक हैं। मित्र व शत्रु आदि रूप इष्टानिष्ट पदार्थोके विषयमें राग-द्वेषके परित्यागका नाम समता है। अतीत, अनागत और वर्तमान काल सम्बन्धी पांच परमेष्ठियोंमें भेद न करके 'णमो अरिहंताणं णमो जिणाणं' इत्यादि वाक्योंके उच्चारणपूर्वक नमस्कार करनेको स्तव कहते हैं। ऋषभादि तीर्थकर, भरतादि केवली तथा आचार्य एवं चैत्यालयादिका भेद करके उनका पृथक् पृथक् गुणानुस्मरण करते हुए शब्दोंच्चारणपूर्वक जो नमस्कार किया जाता है उसे वंदना कहा जाता है। चौरासी लाख गुणोंसे सहित महाव्रतोंके विषयमें उत्पन्न हुए मलके दूर करनेको प्रतिक्रमण कहते हैं। महाव्रतोंका विनाश अथवा उन्हें दूषित करनेवाले कारण न उत्पन्न हो सकें, ऐसा मैं करूंगा; इस प्रकार मनसे आलोचना करके चौरासी लाख व्रतोंकी शुद्धिको ग्रहण करना, यह प्रत्याख्यान कहलाता है। शरीर व आहारकी ओरसे मन एवं वचनकी प्रवृत्तिको हटाकर चित्तको एकाग्रतापूर्वक ध्येय वस्तुकी ओर लगाना, इसे व्युत्सर्ग कहा जाता है। इस प्रकारके इन छह आवश्यकोंकी परिपूर्णताका नाम आवश्यकापरिहीनता है। ५. सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं व्रत-शीलादिविषयकं मलको दूर करके उन्हें सदा निर्मल रखनेका नाम क्षण-लवप्रतिबोधनता है। ६. सम्यग्दर्शन, सम्यज्ञान और सम्यक्चारित्रकी प्राप्तिका नाम लब्धि और इससे होनेवाले हर्षका नाम संवेग है । इस लब्धिरूप सम्पत्तिकी पूर्णताका नाम लब्धिसम्पन्नता है। ७. थामका अर्थ बल-वीर्य होता है । अत एव अपने बल-वीर्यके अनुसार बाह्य एवं अभ्यन्तर दोनों प्रकारके तपके आचरणको यथाथाम-तथातप (शक्तितस्तप) कहा जाता है। ८. अनन्तज्ञान-दर्शनादिके साधनेमें तत्पर रहनेवाले महात्मा साधु कहलाते हैं; जिन सम्यग्दर्शनादिके निमित्तसे आस्रव नष्ट होते हैं उनका साधुओंके लिये परित्याग (दान) करना, यह साधुओंकी प्रासुकपरित्यागता कहलाती है। अभिप्राय यह कि दयाभावसे साधुओंके लिये रत्नत्रयका प्रदान करना, यह साधुओंके लिये प्रासुकपरित्याग कहा जाता है। यह महर्षियोंके ही सम्भव है, गृहस्थोंके सम्भव नहीं है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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