SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 584
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २, ११, १९६] अप्पाबहुगाणुगमे सम्मत्तमग्गणा [४५९ चारित्रलब्धि अनन्तगुणी है ॥ १७० ॥ उससे सामायिक-छेदोपस्थापना-शुद्धिसंयतकी उत्कृष्ट चारित्रलब्धि अनन्तगुणी है ॥ १७१ ॥ उससे सूक्ष्मसाम्परायिक-शुद्धिसंयतकी जघन्य चारित्रलब्धि अनन्तगुणी है ।। १७२ ॥ उससे उसीकी उत्कृष्ट चारित्रलब्धि अनन्तगुणी है ॥ १७३ ॥ उससे यथाख्यात-विहार-शुद्धिसंयतकी अजघन्यानुत्कृष्ट चारित्रलब्धि अनन्तगुणी है ॥ १७४ ।। दंसणाणुवादेण सव्वत्थोवा ओहिंदंसणी ॥ १७५ ॥ चक्खुदंसणी असंखेज्जगुणा ॥ १७६ ॥ केवलदसणी अणंतगुणा ॥ १७७ ॥ अचक्खुदंसणी अणंतगुणा ॥ १७८ ॥ दर्शनमार्गणाके अनुसार अवधिदर्शनी सबसे स्तोक हैं ॥ १७५ ॥ उनसे चक्षुदर्शनी असंख्यातगुणे हैं ॥ १७६ ॥ उनसे केवलदर्शनी अनन्तगुणे हैं ॥ १७७ ।। उनसे अचक्षुदर्शनी अनन्तगुणे हैं ॥ १७८ ॥ लेस्साणुवादेण सव्वत्थोवा सुक्कलेस्सिया ॥१७९॥ पम्मलेस्सिया असंखेज्जगुणा ॥१८० ॥ तेउलेस्सिया संखेज्जगुणा ॥ १८१॥ अलेस्सिया अणंतगुणा ॥१८२ ॥ काउलेस्सिया अणंतगुणा ।। १८३ ॥ णीललेस्सिया विसेसाहिया ॥ १८४ ॥ किण्णलेस्सिया विसेसाहिया ॥ १८५॥ लेश्यामार्गणाके अनुसार शुक्ललेश्यावाले सबसे स्तोक हैं ॥ १७९ ॥ उनसे पद्मलेश्यावाले असंख्यातगुणे हैं ॥ १८० ॥ उनसे तेजोलेश्यावाले संख्यातगुणे हैं ॥ १८१ ॥ उनसे लेश्यारहित अर्थात् अयोगी व सिद्ध अनन्तगुणे हैं ॥ १८२ ॥ उनसे कापोतलेश्यावाले अनन्तगुणे हैं ॥१८३ ॥ उनसे नीललेश्यावाले विशेष अधिक हैं ॥१८४॥ उनसे कृष्णलेश्यावाले विशेष अधिक हैं ॥१८५॥ भवियाणुवादेण सव्वत्थोवा अभवसिद्धिया ॥ १८६ ॥ णेव भवसिद्धिया णेव अभवसिद्धिया अणंतगुणा ॥ १८७ ॥ भवसिद्धिया अणंतगुणा ॥ १८८ ॥ भव्यमार्गणाके अनुसार अभव्यसिद्धिक जीव सबसे स्तोक हैं ॥ १८६ ॥ उनसे न भव्यसिद्धिक न अभव्यसिद्धिक ऐसे सिद्ध जीव अनन्तगुणे हैं ॥ १८७ ॥ उनसे भव्यसिद्धिक जीव अनन्तगुणे हैं ॥ १८८ ॥ __सम्मत्ताणुवादेण सव्वत्थोवा सम्मामिच्छाइट्ठी ॥ १८९ ॥ सम्माइट्ठी असंखेज्जगुणा ॥ १९० ॥ सिद्धा अणंतगुणा ॥ १९१ ॥ मिच्छाइट्ठी अणंतगुणा ॥ १९२ ॥ सम्यक्त्वमार्गणाके अनुसार सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव सबसे स्तोक हैं ॥ १८९ ॥ उनसे सम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं ॥ १९० ॥ उनसे सिद्ध अनन्तगुणे हैं ॥ १९१ ॥ उनसे मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं ॥ १९२ ॥ अब प्रकृत मार्गणामें अन्य प्रकारसे भी अल्पबहुत्व कहा जाता है सव्वत्थोवा सासणसम्माइट्ठी ॥१९३॥ सम्मामिच्छाइट्ठी संखेज्जगुणा ॥१९४॥ उवसमसम्माइट्ठी असंखेज्जगुणा ॥ १९५॥ खइयसम्माइट्ठी असंखेज्जगुणा ॥१९६॥ वेदग Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy