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________________ ४६० ] छक्खंडागमे खुदाबंधो [ २, ११, १९७ सम्माट्ठी असंखेज्जगुणा ॥ १९७ ॥ सम्माइट्ठी विसेसाहिया ।। १९८ ॥ सिद्धा अनंतगुणा ॥ १९९ ॥ मिच्छाइट्ठी अनंतगुणा ॥ २०० ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि सबसे स्तोक हैं ॥ १९३ ॥ उनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं ॥ १९४ ॥ उनसे उपशमसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं ॥ १९५ ॥ उनसे क्षायिकसम्यग्दृष्टि असंख्यात - गुणे हैं ॥ १९६ ॥ उनसे वेदगसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं ॥ १९७ ॥ उनसे सम्यग्दृष्टि विशेष अधिक हैं ॥१९८॥ उनसे सिद्ध अनन्तगुणे हैं ॥ १९९ ॥ उनसे मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं ॥ २०० ॥ सणियाणुवादेण सव्वत्थोवा सण्णी ।। २०१ ।। णेव सण्णी णेव असण्णी अनंतगुणा ॥ २०२ ॥ असण्णी अनंतगुणा ।। २०३ ॥ संज्ञिमार्गणाके अनुसार संज्ञी सबसे स्तोक हैं ॥ २०१ ॥ उनसे न संज्ञी न असंज्ञी ऐसे सिद्ध जीव अनन्तगुणे हैं ॥ २०२ ॥ उनसे असंज्ञी अनन्तगुणे हैं ॥ २०३॥ आहारावादेण सव्वत्थोवा अणाहारा अबंधा || २०४ || बंधा अनंतगुणा || २०५ ॥ आहारा असंखेज्जगुणा ॥ २०६ ॥ आहारमार्गणा के अनुसार अनाहारक अबन्धक जीव सबसे स्तोक हैं ॥ २०४ ॥ उनसे अनाहारक बन्धक जीव अनन्तगुणे हैं ॥ २०५ ॥ उनसे आहारक असंख्यातगुगे हैं ॥ २०६ ॥ ॥ अल्पबहुत्वानुगम समाप्त हुआ ॥। ११ ॥ महादंडओ तो सव्वजीवेसु महादंडओ कादव्वो भवदि ॥ १ ॥ आगे सब जीवोंके विषय में महादण्डक किया जाता है ॥ १ ॥ यह महादण्डक प्रकृत क्षुद्रकबन्धके ग्यारह अनुयोगद्वारों मेंयोगद्वार में - सूचित अर्थकी प्ररूपणा करनेके कारण इस क्षुद्रकबन्धकी समझना चाहिये । Jain Education International सव्वत्थोवा मणुसपज्जत्ता गन्भोवक्कतिया || २॥ मनुष्य पर्याप्त गर्भोपक्रान्तिक सबसे स्तोक हैं ॥ २ ॥ - For Private & Personal Use Only विशेषतः अल्पबहुत्व अनुचूलिकाके समान है, ऐसा मणुसिणीओ संखेज्जगुगाओ || ३ || गर्भोपक्रान्तिक पर्याप्त मनुष्योंसे मनुष्यनियां संख्यातगुणी हैं ॥ ३ ॥ www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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