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________________ २, ९, ६२ ) अंतराणुगमे सम्मत्तमग्गणा समसमगणा [ ४४३ सूक्ष्मसाम्परायिक-शुद्धिसंयत जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ४२ ॥ उनका अन्तर जघन्यसे एक समय होता है ।। ४३ ॥ तथा उत्कर्षसे वह छह मास तक होता है । दंसणाणुवादेण चक्खुदंसणि-अचक्खुदंसणि-ओहिदंसणिकेवलदंसणीमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ ४५ ॥ णत्थि अंतरं ॥ ४६ ॥ णिरंतरं ॥ ४७ ॥ ___ दर्शनमार्गणाके अनुसार चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी, अवधिदर्शनी और केवलदर्शनी जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥४५॥ उनका अन्तर नहीं होता है ॥ ४६।। ये जीवराशिय निरन्तर हैं ॥ ४७ ॥ लेस्साणुवादेण किण्हलेस्सिय-णीललेस्सिय-काउलेस्सिय-तेउलेस्सिय-पम्मलेस्सियसुक्कलेंस्सियाणमंतर केवचिरं कालादो होदि १ ॥ ४८ ॥ णत्थि अंतरं ॥ ४९ ॥ णिरंतरं ॥ लेश्यामार्गणाके अनुसार कृष्णलेश्यावाले, नीललेश्यावाले, कापोतलेश्यावाले, तेजोलेश्यावाले, पालेश्यावाले और शुक्ललेझ्यावाले जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ४८ ॥ उनका अन्तर नहीं होता है ॥ ४९ ॥ ये जीवराशियां निरन्तर हैं ॥ ५० ॥ __ भवियाणुवादेण भवसिद्धिय-अभवसिद्धियाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥५१॥ णत्थि अंतरं ॥ ५२ ॥ णिरंतरं ॥ ५३॥ भव्यमार्गणाके अनुसार भव्यसिद्धिक और अभव्यसिद्धिक जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ५१ ॥ उनका अन्तर नहीं होता है ॥ ५२ ॥ वे जीवराशियां निरन्तर हैं ॥ ५३ ।। सम्मत्ताणुवादेण सम्माइटि-खइयसम्माइद्वि-वेदगसम्माइट्ठि-मिच्छाइट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि १ ॥ ५४॥ णत्थि अंतरं ॥ ५५ ॥ णिरंतरं ॥५६॥ सम्यक्त्वमार्गणाके अनुसार सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ५४ ॥ उनका अन्तर नहीं होता है ॥ ५५ ॥ वे जीवराशियां निरन्तर हैं ॥ ५६ ॥ उवसमसम्माइट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ ५७ ॥ जहण्णेण एगसमयं ।। ५८ ॥ उक्कस्सेण सत्त रादिंदियाणि ॥ ५९ ॥ उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ५७ ॥ उनका अन्तर जघन्यसे एक समय मात्र होता है ॥ ५८ ॥ तथा उत्कर्षसे वह सात रात-दिन प्रमाण होता है । सासणसम्माइट्ठि-सम्मामिच्छाइट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ ६०॥ जहण्णेण एगसमयं ॥ ६१ ॥ उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो ॥ ६२ ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥६०॥ उनका अन्तर जघन्यसे एक समय मात्र होता है ॥६१ ॥ तथा उत्कर्षसे वह पल्योपमके असंख्यातवें भाग प्रमाण होता है ॥ ६२ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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