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________________ ४४२] छक्खंडागमे खुद्दाबंधो [२, ९, २७ वैक्रियिकमिश्रकाययोगियोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ २४ । उनका अन्तर जघन्यसे एक समय मात्र होता है ॥ २५ ॥ तथा उत्कर्षसे वह बारह मुहूर्त मात्र होता है ॥२६॥ आहारकायजोगि-आहारमिस्सकायजोगीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि? ॥२७॥ जहण्णेण एगसमयं ॥ २८ ॥ उक्कस्सेण वासपुधत्तं ॥ २९ ॥ आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ! ॥ २७ ॥ उनका अन्तर जघन्यसे एक समय मात्र होता है ॥ २८ ॥ तथा उत्कर्षसे वह वर्षपृथक्त्व प्रमाण होता है ॥ २९ ॥ वेदाणुवादेण इत्थिवेदा पुरिसवेदा णqसयवेदा अवगदवेदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ ३० ॥ णस्थि अंतरं ॥ ३१ ॥ णिरंतरं ॥ ३२ ॥ - वेदमार्गणाके अनुसार स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी, नपुंसकवेदी और अपगतवेदी जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥३०॥ उनका अन्तर नहीं होता है ॥३१॥ ये जीवराशियां निरन्तर हैं । कसायाणुवादेण कोधकसाइ - माणकसाइ - मायकसाइ - लोभकसाइ -अकसाईणमंतरं केवचिरं कालादो होदि १ ॥ ३३ ॥ णत्थि अंतरं ॥ ३४ ॥ णिरंतरं ॥ ३५ ॥ कषायमार्गणाके अनुसार क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी, लोभकषायी और अकषायी जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ३३ ॥ उनका अन्तर नहीं होता ॥ ३४ ॥ ये जीवराशियां निरन्तर हैं ॥ ३५ ॥ __णाणाणुवादेण मदिअण्णाणि-सुदअण्णाणि-विभंगणाणि-आभिणिबोहिय-सुद-ओहिणाणि-मणपज्जवणाणि-केवलणाणीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि १ ॥ ३६ ॥ णत्थि अंतरं ॥३७॥ णिरंतरं ॥ ३८॥ ज्ञानमार्गणाके अनुसार मति-अज्ञानी, श्रुत-अज्ञानी, विभंगज्ञानी, आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ३६ । उनका अन्तर नहीं होता है ॥ ३७ ॥ ये जीवराशियां निरन्तर हैं ॥ ३८ ॥ संजमाणुवादेण संजदा सामाइय-छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजदा परिहारसुद्धिसंजदा जहाक्खादविहारसुद्धिसंजदा संजदासजदा असंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥३९॥ णत्थि अंतरं ॥ ४० ॥ णिरंतरं ॥४१॥ संयममार्गणाके अनुसार संयत, सामायिक छेदोपस्थापना-शुद्धिसंयत, परिहार-शुद्धिसंयत, यथाख्यात-विहार-शुद्धिसंयत, संयतासंयत और असंयत जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥३९॥ उनका अन्तर नहीं होता है ॥ ४० ॥ ये जीवराशियां निरन्तर हैं ॥ ४१ ॥ सुहमसांपराइय-सुद्धिसंजदाणं अंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ ४२ ॥ जहण्णेण एगसमयं ॥ ४३ ॥ उक्कस्सेण छम्मासाणि ॥ ४४ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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