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________________ २, ७, २१५] फोसणाणुगमे लेस्सामग्गण्णा [५३१ ॥ १९७ ॥ अट्ठ-णवचोदसभागा वा देसूणा ॥ १९८॥ समुद्घातकी अपेक्षा तेजोलेश्यावाले जीवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ? ॥ १९६ ॥ उनके द्वारा समुद्घातकी अपेक्षा लोकका असंख्यातवां भाग स्पृष्ट है ॥ १९७ ॥ अथवा, अतीत कालकी अपेक्षा उनके द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और नौ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं ॥ उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं १ ॥ १९९ ॥ लोगस्स असंखेजदिभागो ॥ २०० ॥ दिवड्ढ-चोदसभागा वा देसूणा ।। २०१॥ उपपादकी अपेक्षा तेजोलेश्यावाले जीवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ? ॥ १९९ ॥ उनके द्वारा उपपाद पदकी अपेक्षा लोकका असंख्यातवां भाग स्पृष्ट है ॥ २०० ॥ अथवा, अतीत कालकी अपेक्षा उनके द्वारा कुछ कम डेढ़ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं ॥ २०१॥ पम्मलेस्सिया सत्थाण-समुग्धादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं १ ॥२०२॥ लोगस्स असंखेन्जदिभागो ॥ २०३ ॥ अट्ठ-चोदसभागा वा देसूणा ॥ २०४॥ पद्मलेश्यावाले जीवोंने स्वस्थान और समुद्घात पदोंसे कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? ॥ २०२ ॥ उपर्युक्त जीवोंने उक्त पदोंसे लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ २०३ ॥ भथवा, अतीत कालकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं ॥ २०४ ॥ उववादेहि केवडियं खेतं फोसिदं ? ॥ २०५ ।। लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ २०६ ॥ पंच-चोदसभागा वा देसूणा ।। २०७ ।। उक्त जीवों द्वारा उपपादकी अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ? ॥ २०५॥ उक्त जीवों द्वारा उपपादकी अपेक्षा लोकका असंख्यातवां भाग स्पृष्ट है ॥ २०६ ॥ अथवा, अतीत कालकी अपेक्षा उक्त जीवों द्वारा कुछ कम पांच बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं । २०७ ॥ सुक्कलेस्सिया सत्थाण-उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? ॥ २०८ ॥ लोगस्स असंखेज्जदिभागो ।। २०९ ॥ छ-चोदसभागा वा देसूणा ॥ २१० ॥ शुक्ललेश्यावाले जीवोंने स्वस्थान और उपपाद पदोंसे कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? ॥ २०८ ॥ उक्त पदोंसे उनके द्वारा लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया गया है ॥ २०९ ॥ अथवा, अतीत कालकी अपेक्षा उन्होंने कुछ कम छह बटे चौदह भागोंका स्पर्श किया है ॥२१०॥ समुग्घादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? ॥ २११ ॥ लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥२१२ ॥ छ-चोद्दसभागा वा देसूणा ॥ २१३ ॥ शुक्ललेश्यावाले जीवों द्वारा समुद्घात पदोंसे कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ? ॥२११॥ समुद्घात पदोंसे उनके द्वारा लोकका असंख्यातवां भाग स्पृष्ट है ? ॥ २१२ ॥ अथवा, अतीत कालकी अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं ? ॥ २१३ ॥ असंखेज्जा वा भागा ।। २१४ ॥ सबलोगो वा ।। २१५ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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