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________________ छक्खंडागमे खुदाबंधो [ २, ७, २१६ अथवा प्रतर समुद्घातगत उक्त जीवों द्वारा लोकका असंख्यात बहुभाग स्पृष्ट है ॥ २१४ ॥ तथा लोकपूरण समुद्घातगत उनके द्वारा सर्व लोक ही स्पृष्ट है || २१५ ॥ ४३२ ] भवियाणुवादेण भवसिद्धिय अभवसिद्धिय सत्थाण-समुग्धाद-उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं १ ।। २१६ ।। सव्वलोगो ।। २१७ ॥ भव्यमार्गणाके अनुसार भव्यसिद्धिक और अभव्यसिद्धिक जीवोंके द्वारा स्वस्थान, समुद्घात एवं उपपाद पदोंसे कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ? ॥ २१६ ॥ उक्त पदोंसे उनके द्वारा सर्व लोक स्पृष्ट है ॥ २१७ ॥ सम्मत्ताणुवादेण सम्मादिट्ठी सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं १ ॥ २१८ ॥ लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ २१९ ॥ अट्ठ चोदसभागा वा देसूणा ।। २२० ॥ सम्यक्त्वमार्गणानुसार सम्यग्दृष्टि जीवोंने स्वस्थान पदोंसे कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? ॥ २९८ ॥ स्वस्थान पदोंसे उन्होंने लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ।। २१९ ॥ अथवा, अतीत कालकी अपेक्षा उन्होंने कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं । ॥ २२० ॥ मुग्धादे हि केवडियं खेत्तं फोसिदं । ॥ २२१ || लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥। २२२ ।। अट्ठ-चोदसभागा वा देसूणा ।। २२३ || असंखेज्जा वा भागा वा ॥ २२४ ॥ सव्वलोगो वा ।। २२५ ॥ सम्यग्दृष्टि जीवों द्वारा समुद्घात पदोंसे कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ? ॥ २२९ ॥ दृष्ट जीवों द्वारा समुद्घात पदोंसे लोकका असंख्यातवां भाग स्पृष्ट है ॥ २२२ ॥ अथवा, अतीत कालकी अपेक्षा उनके द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं ॥ २२३ ॥ अथवा, प्रतर समुद्घातकी अपेक्षा उनके द्वारा असंख्यात बहुभाग प्रमाण क्षेत्र स्पृष्ट है ॥ २२४ ॥ अथवा, लोकपूरण समुद्घातकी अपेक्षा उनके द्वारा सर्व लोक ही स्पृष्ट है || २२५ ॥ उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? ।। २२६ || लोगस्स असंखेज्जदिभागो ।। २२७ ।। छ-चोद्दसभागा वा देसूणा ।। २२८ ॥ उक्त सम्यग्दृष्टि जीवों द्वारा उपपादकी अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ? ॥ २२६ ॥ सम्यग्दृष्टि जीवों द्वारा उपपादकी अपेक्षा लोकका असंख्यातवां भाग स्पृष्ट है ॥ २२७ ॥ अथवा, अतीत कालकी अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं ॥ २२८ ॥ खइयसम्माट्ठी सत्याणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं १ ।। २२९ ।। लोगस्स असंखेज्जदिभागो ।। २३० ।। अट्ठ- चोहसभागा वा देसूणा ।। २३१ ॥ क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवोंने स्वस्थान पदोंसे कितना क्षेत्र स्पर्श क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवोंने स्वस्थान पदोंसे लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श अथवा, उनके द्वारा अतीत कालकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पृष्ट किये गये हैं | किया है : ।। २२९ ॥ किया है || २३० ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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