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________________ प्रस्तावना उक्त भावोंमेंसे किस गुणस्थान और किस मार्गणास्थान में कौनसा भाव होता है, इसका विवेचन इस भाव प्ररूपणामें किया गया है। जैसे ओघकी अपेक्षा पूछा गया कि 'मिथ्यादृष्टि ' यह कौनसा भाव है ? इसका उत्तर दिया गया कि मिथ्यादृष्टि यह औदयिक भाव है। इसका कारण यह है कि जीवोंके मिथ्यादृष्टि अर्थात् विपरीत श्रद्धा मिथ्यात्वकर्मके उदयसे होती है। यहां यह शंका की जा सकती है कि जब मिथ्यादृष्टि जीवके मिथ्यात्व भाव के अतिरिक्त ज्ञान, दर्शन, भव्यत्व आदि अन्य भी भाव पाये जाते है, तब उसके एक मात्र औदयिक भाव ही क्यों बतलाया गया? इसका उत्तर यह दिया गया है कि यद्यपि मिथ्यादृष्टि जीवके औदयिक भावके अतिरिक्त अन्य भाव भी होते हैं, किन्तु वे मिथ्यादृष्टित्वके कारण नहीं है, एक मात्र मिथ्यात्वकर्मका उदय ही मिथ्यादृष्टित्वका कारण होता है, इसलिए मिथ्यात्व गुणस्थानमें पैदा होनेवाले मिथ्यादृष्टिको औदयिक भाव कहा गया है। दूसरे गुणस्थानमें अन्य भावोंके रहते हुए भी पारिणामिक बतलानेका कारण यह है कि जिस प्रकार जीवत्व आदि पारिणामिक भावोंके लिए कर्मोंका उदय उपशम आदि कारण नहीं है उसी प्रकार सासादन सम्यक्त्वरूप भावके लिए दर्शनमोहनीयकर्मका उदय, उपशमादि कोई भी कारण नहीं है, इसलिए यहां पारिणामिक भाव ही जानना चाहिए । तीसरे गुणस्थानमें क्षायोपशमिक भाव होता है। यहां यह शंका उठाई जा सकती है कि प्रतिबन्धी कर्मके उदय होनेपर भी जो जीवके स्वाभाविक गुणका अंश पाया जाता है वह क्षायोपशमिक कहलाता है। किन्तु सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयमें तो सम्यक्त्वगुणकी कणिका भी अवशिष्ट नहीं रहती है। यदि ऐसा न माना जाय तो सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके सर्वघातिपना नहीं बन सकता। अतएव सम्यग्मिथ्यात्व भावको क्षायोपशमिक मानना ठीक नहीं है। इसका उत्तर यह है कि सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके उदय होनेपर श्रद्धान और अश्रद्धानरूप एक मिश्रभाव उत्पन्न होता है । उसमें जो श्रद्धानांश है, वह सम्यक्त्वगुणका अंश है, उसे सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका उदय नष्ट नहीं करता । अतः सम्यग्मिथ्यात्व भावको क्षायोपशमिक ही मानना चाहिए । .... चौथे गुणस्थानमें औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक ये तीन भाव पाये जाते हैं। इसका कारण यह है कि यहांपर दर्शन मोहनीय कर्मका उपशम, क्षय और क्षयोपशम ये तीनों ही होते हैं। आदिके ये चार गुणस्थान दर्शनमोहनीय कर्मके उदय, उपशम, क्षय आदिसे उत्पन्न होते हैं, इसलिए उन गुणस्थानोंमें अन्य भावोंके पाये जानेपरभी दर्शनमोहनीयकी अपेक्षासे भावोंकी प्ररूपणा की गई है। चौथे गुणस्थानतक जो असंयमभाव पाया जाता है, वह चारित्र मोहनीय कर्मके उदयसे उत्पन्न होनेके कारण औदयिक भाव है, पर यहां उसकी विवक्षा नहीं की गई है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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