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________________ ४०] छक्खंडागम मास है। तीसरी सान्तरमार्गणा आहारककाय योगमार्गणा है। इसका उत्कृष्ट अन्तरकाल वर्षपृथक्त्व है। चौथी आहारकमिश्रकाययोगमार्गणा है । इसका भी उत्कृष्ट अन्तरकाल वर्षपृथक्त्व है। पांचवीं वैक्रियिकमिश्रकाययोगमार्गणा है । इसका उत्कृष्ट अन्तरकाल बारह मुहूर्त है। छठी लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यगतिमार्गणा है, सातवीं सासादन सम्यक्त्वमार्गणा है और आठवीं सम्यग्मिथ्यात्वमार्गणा है । इन तीनों ही मार्गणाओंका उत्कृष्ट अन्तरकाल पृथक्-पृथक् पत्यका असंख्यातवां भाग है। इन सब सान्तरमार्गणाओंका जघन्य अन्तरकाल एक समयप्रमाण ही है। इन सभी सान्तरमार्गणाओंका , अन्तरकाल पूरा होती ही उस-उस मार्गणावाले जीव नियमसे उत्पन्न हो जाते हैं। इन आठ मार्गणाओंके सिवाय शेष सभी मार्गणाओंवाले जीव सदा ही पाये जाते हैं । एक जीवकी अपेक्षा किस गुणस्थान और मार्गणास्थानका कितना जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर सम्भव है, तथा नाना जीवोंकी अपेक्षा किसका कितना अन्तर सम्भव है, इसका विशेष . परिचय तो इस प्ररूपणाके स्वाध्याय करनेपर ही मिल सकेगा। ७ भावप्ररूपणा इस भावप्ररूपणा में विभिन्न गुणस्थानों और मार्गणास्थानों में होनेवाले भावोंका निरूपण किया गया है। कर्मोंके उदय, उपशम आदिके निमित्तसे जीवके उत्पन्न होनेवाले परिणाम विशेषोंको भाव कहते हैं। ये भाव पांच प्रकारके होते हैं-१ औदयिक भाव, २ औपशमिक भाव, ३ क्षायिक भाव, ४ क्षायोपशमिक भाव और ५ पारिणामिक भाव । कर्मोके उदयसे जो भाव होते है, उन्हें औदयिक भाव कहते हैं। इसके इक्कीस भेद हैं- नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव ये चार गतियां; स्त्री, पुरुष और नपुंसक ये तीन लिंग; क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कषाय; मिथ्यात्व, असिद्धत्व, अज्ञान, असंयम और कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल ये छह लेश्याएं । मोहकर्मके उपशमसे जो भाव उत्पन्न होते हैं उन्हें औपशमिक भाव कहते हैं। इसके दो भेद हैं-- १ औपशमिकसम्यक्त्व और २ औपशमिकचारित्र । घातियाकर्मोके क्षयसे जो भाव उत्पन्न होते हैं उन्हें क्षायिकभाव कहते हैं। इसके नौ भेद हैं- १ क्षायिकसम्यक्त्व, २ क्षायिकचारित्र, ३ क्षायिकज्ञान, ४ क्षायिकदर्शन, ५ क्षायिकदान, ६ क्षायिकलाभ, ७ क्षायिकभोग, ८ क्षायिकउपभोग और ९ क्षायिकवीर्य । घातियाकर्मोके क्षयोपशमसे जो भाव उत्पन्न होते हैं, उन्हें क्षायोपशमिक भाव कहते हैं। इसके अट्ठारह भेद हैं- मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ये चार ज्ञान; कुमति, कुश्रुत और विभंगावधि ये तीन अज्ञान; चक्षु, अचक्षु और अवधि ये तीन दर्शन; क्षायोपशमिक दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य ये पांच लब्धियां; क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक चारित्र और संयमासंयम । जो भाव किसी भी कर्मके उदय, उपशम आदिकी अपेक्षा न रखकर स्वतः स्वभाव अनादिसे चले आ रहे हैं, उन्हें पारिणामिक भाव कहते हैं। इसके तीन भेद हैं- १ जीवत्व, २ भव्यत्व और ३ अभव्यत्व । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org .
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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