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________________ २, ६, ५३ ] खेत्ताणुगमे जोगमग्गणा [४११ बादर वायुकायिक और बादर वायुकायिक अपर्याप्त समुद्घात व उपपादसे कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? सर्व लोकमें रहते हैं ॥ ४२ ॥ बादरवाउपज्जत्ता सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ? ॥ ४३ ॥ लोगस्स संखेज्जदिभागे ॥ ४४ ॥ ___ बादर वायुकायिक पर्याप्त जीव स्वस्थान, समुद्घात और उपपादसे कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? ॥ ४३ ॥ स्वस्थान, समुद्घात व उपपादसे वे लोकके संख्यातवें भागमें रहते हैं ।। ४४ ॥ वणप्फदिकाइय-णिगोदजीवा सुहुमवणप्फदिकाइय-सुहुमणिगोदजीवा तस्सेव पज्जत्त-अपज्जत्ता सत्थाणेण समुग्धादेण उववादेण केवडिखेत्ते ? ॥४५॥ सव्वलोए ॥४६॥ वनस्पतिकायिक, वनस्पतिकायिक पर्याप्त, वनस्पतिकायिक अपर्याप्त, निगोद जीव, निगोद जीव पर्याप्त, निगोद जीव अपर्याप्त, सूक्ष्म वनस्पतिकायिक, सूक्ष्म वनस्पतिकायिक पर्याप्त, सूक्ष्म वनस्पतिकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म निगोद जीव, सूक्ष्म निगोद जीव पर्याप्त और सूक्ष्म निगोद जीव अपर्याप्त, ये स्वस्थान, समुद्घात व उपपादकी अपेक्षा कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? ॥४५॥ उक्त पदोंसे वे सर्व लोकमें रहते हैं ॥ ४६॥ बादरवणप्फदिकाइया बादरणिगोदजीवा तस्सेव पज्जत्ता अपज्जत्ता सत्थाणेण केवडिखेत्ते ? ।। ४७ ॥ लोगस्स असंखेज्जदिभागे ।। ४८॥ बादर वनस्पतिकायिक, बादर वनस्पतिकायिक पर्याप्त, बादर वनस्पतिकायिक अपर्याप्त, बादर निगोद जीव, बादर निगोद जीव पर्याप्त और बादर निगोद जीव अपर्याप्त; ये स्वस्थानसे कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? ॥४७॥ स्वस्थानकी अपेक्षा वे लोकके असंख्यातवें भागमें रहते हैं ॥४८॥ समुग्धादेण उववादेण केवडिखेत्ते ? ॥ ४९ ॥ सवलोए ॥ ५० ॥ उक्त जीव समुद्घात व उपपादकी अपेक्षा कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? ॥ ४९॥ उक्त बादर वनस्पतिकायिक आदि समुद्घात व उपपादकी अपेक्षा सर्व लोकमें रहते हैं ॥ ५० ॥ तसकाइय-तसकाइयपज्जत्त-अप्पजत्ता पंचिंदिय-पज्जत्त-अपज्जत्ताणं भंगो ॥५१॥ त्रसकायिक, त्रसकायिक पर्याप्त और त्रसकायिक अपर्याप्त जीवोंके क्षेत्रकी परूपणा पंचेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय पर्याप्त और पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवोंके समान है ॥ ५१ ॥ जोगाणुवादेण पंचमणजोगी पंचवचिजोगी सत्थाणेण समुग्धादेण केवडिखेत्ते ? ॥ ५२ ॥ लोगस्स असंखेज्जदिभागे ।। ५३ ॥ योगमार्गणाके अनुसार पांचों मनोयोगी और पांचों वचनयोगी जीव स्वस्थान व समुद्घातकी अपेक्षा कितने क्षेत्रमें रहते हैं ॥ ५२ ॥ उक्त दोनों पदोंसे वे लोकके असंख्यातवें भागमें रहते हैं ॥ ५३ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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