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________________ ४१२] छक्खंडागमे खुद्दाबंधो [ २, ६, ५४ ___ कायजोगि-ओरालियमिस्सकायजोगी सत्थाणेण समुग्धादेण उववादेण केवडिखेत्ते ? ॥ ५४ ॥ सबलोए ॥ ५५ ॥ काययोगी और औदारिकमिश्रकाययोगी जीव स्वस्थान, समुद्घात व उपपाद पदसे कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? ॥ ५४ ॥ उक्त पदोंसे वे सर्व लोकमें रहते हैं ॥ ५५ ॥ ओरालियकायजोगी सत्थाणेण समुग्धादेण केवडिखेते ? ॥ ५६ ॥ सव्वलोए । औदारिककाययोगी जीव स्वस्थान व समुद्घातकी अपेक्षा कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? ॥ ५६ ॥ स्वस्थान व समुद्धातकी अपेक्षा वे सर्व लोकमें रहते हैं ॥ ५७ ।। उववादं णत्थि ॥५८॥ औदारिककाययोगी जीवोंके उपपाद पद नहीं होता ॥ ५८ ॥ वेउब्वियकायजोगी सत्थाणण समुग्घादेण केवडिखेत्ते ? ॥ ५९॥ लोगस्स असंखेज्जदिभागे ॥६॥ वैक्रियिककाययोगी स्वस्थान और समुद्घातसे कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? ॥ ५९॥ स्वस्थान व समुद्धातसे वे लोकके असंख्यातवें भागमें रहते हैं ॥ ६० ॥ उववादो णत्थि ॥ ६१॥ वैक्रियिककाययोगियोंके उपपाद पद नहीं होता ॥ ६१ ॥ वेउब्बियमिस्सकायजोगी सत्थाणेण केवडिखेत्ते ? ॥६२॥ लोगस्स असंखेज्जदिभागे ॥ ६३ ॥ वैक्रियिकमिश्रकाययोगी स्वस्थानकी अपेक्षा कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? ॥६२॥ स्वस्थानकी अपेक्षा वे लोकके असंख्यातवें भागमें रहते हैं ॥ ६३ ॥ समुग्धाद-उववादा णत्थि ॥ ६४ ॥ वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंके समुद्घात और उपपाद पद नहीं होते हैं ॥ ६४ ॥ आहारकायजोगी वेउब्धियकायजोगिभंगो ॥६५॥ आहारकाययोगियोंके क्षेत्रकी प्ररूपणा वक्रियिककाययोगियोंके क्षेत्रके समान है ॥ ६५ ।। आहारमिस्सकायजोगी वेउब्बियमिस्सभंगो ।। ६६ ॥ आहारमिश्रकाययोगियोंके क्षेत्रकी प्ररूपणा वैक्रियिकमिश्रकाययोगियोंके समान है ॥६६॥ कम्मइयकायजोगी केवडिखेत्ते ? ॥ ६७ ॥ सव्वलोए ।। ६८ ॥ कार्मणकाययोगी जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? ॥ ६७ ॥ वे सर्व लोकमें रहते हैं ॥६८॥ वेदाणुवादेण इत्थिवेदा पुरिसवेदा सत्थाणेण समुग्धादेण उववादेण केवडिखेत्ते ? ॥ ६९ ॥ लोगस्म असंखेज्जदिभागे ॥ ७० ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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