SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 528
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २, ५, ११८] दव्वपमाणाणुगमे णाणमग्गणा [ ४०३ वेदमार्गणाके अनुसार स्त्रीवेदी द्रव्यप्रमाणसे कितने हैं ? ॥१०२॥ स्त्रीवेदी द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा देवियोंसे कुछ अधिक हैं ॥ १०३ ॥ पुरिसवेदा दव्वफ्माणेण केवडिया १ ॥ १०४ ॥ देवेहि सादिरेयं ॥ १०५ ॥ पुरुषवेदी द्रव्यप्रमाणसे कितने हैं ? ॥ १०४ ॥ पुरुषवेदी द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा देवोंसे कुछ अधिक हैं ॥ १०५ ॥ णqसयवेदा दव्वपमाणेण केवडिया ? ॥१०६ ॥ अणंता ॥ १०७॥ नपुंसकवेदी द्रव्यप्रमाणसे कितने हैं ? ॥१०६॥ नपुंसकवेदी द्रव्यप्रमाणसे अनन्त हैं। अणंताणताहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि ण अवहिरंति कालेण ।। १०८ ॥ नपुंसकवेदी कालकी अपेक्षा अनन्तानन्त अवसर्पिणी-उत्सर्पिणियोंसे अपहृत नहीं होते हैं। खेत्तेण अणंताणंता लोगा ॥१०९॥ नपुंसकवेदी क्षेत्रकी अपेक्षा अनन्तानन्त लोक प्रमाण हैं ॥ १०९ ॥ अवगदवेदा दव्वपमाणेण केवडिया ? ॥ ११० ॥ अणंता ॥१११ ॥ अपगतवेदी द्रव्यप्रमाणसे कितने हैं ? ॥ ११० ॥ अपगतवेदी द्रव्यप्रमाणसे अनन्त हैं । कसायाणुवादेण कोधकसाई माणकसाई मायकसाई लोभकसाई दव्वपमाणेण केवडिया ? ॥११२ ॥ कषायमार्गणाके अनुसार क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायी द्रव्यप्रमाणसे कितने हैं ? ॥ ११२ ॥ अणंता ॥११३॥ अणंताणताहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि ण अवहिरंति कालेण ॥ उपर्युक्त चारों कषायवाले जीव द्रव्यप्रमाणसे अनन्त हैं ॥ ११३ ॥ कालकी अपेक्षा वे अनन्तानन्त अवसर्पिणी-उत्सर्पिणियोंके द्वारा अपहृत नहीं होते हैं ॥ ११४ ॥ खेत्तेण अणंताणंता लोगा ॥११५ ॥ उक्त चारों कषायवाले जीव क्षेत्रकी अपेक्षा अनन्तानन्त लोक प्रमाण हैं ॥ ११५॥ अकसाई दव्वपमाणेण केवडिया ? ॥ ११६ ॥ अणंता ॥ ११७॥ अकषायी जीव द्रव्यप्रमाणसे कितने हैं ? ॥ ११६ ॥ अकषायी जीव द्रव्यप्रमाणसे अनन्त हैं ॥ ११७ ॥ णाणाणुवादेण मदिअण्णाणी सुदअण्णाणी णqसयभंगो ॥ ११८ ॥ ज्ञानमार्गणाके अनुसार मत्यज्ञानी और श्रुत-अज्ञानियोंका द्रव्यप्रमाण नपुंसकवेदियोंके समान है ॥ ११८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy