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________________ ३९०] छक्खंडागमे खुद्दाबंधो [२, ३,१३७ णत्थि अंतरं, णिरंतरं ॥ १३७ ॥ क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवोंका अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥ १३७ ॥ सासणसम्माइट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि १ ॥ १३८ ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ १३८ । जहणेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो । १३९ ॥ उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टू देसूणं ॥ १४० ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका अन्तर जघन्यसे पत्योपमके असंख्यातवें भाग प्रमाण काल तक होता है ॥१३९॥ तथा उनका उत्कृष्ट अन्तर अर्ध पुद्गलपरिवर्तन मात्र काल तक होता है । मिच्छाइट्ठी मदिअण्णाणिभंगो ॥ १४१॥ मिथ्यादृष्टि जीवोंके अन्तरकी प्ररूपणा मत्यज्ञानी जीवोंके समान है ॥ १४१ ॥ सण्णियाणुवादेण सण्णीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ।। १४२ ॥ संज्ञीमार्गणाके अनुसार संज्ञी जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ १४२ ।। जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं ॥१४३॥ उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्ट। संज्ञी जीवोंका जघन्य अन्तर क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण होता है ॥ १४३ ॥ तथा उनका उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अनन्त काल तक होता है ।। १४४ ॥ असण्णीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ १४५ ।।। असंज्ञी जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ १४५ ॥ जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं ॥ १४६ ॥ उक्कस्सेण सागरोवमसदपुधत्तं ॥ १४७ ॥ असंज्ञी जीवोंका जघन्य अन्तर क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण होता है ॥ १४६ ॥ तथा उनका उत्कृष्ट अन्तर सागरोपमशतपृथक्त्व प्रमाण काल तक होता है ॥ १४७ ॥ आहाराणुवादेण आहाराणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ १४८॥ आहारमार्गणाके अनुसार आहारक जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ १४८ ॥ जहण्णेण एगसमयं ॥ १४९ ॥ उक्कस्सेण तिण्णिसमयं ॥ १५० ॥ आहारक जीवोंका जघन्य अन्तर एक समय मात्र होता है ॥ १४९ ॥ तथा उनका उत्कृष्ट अन्तर तीन समय प्रमाण होता है || १५० ॥ अणाहारा कम्मइयकायजोगिभंगो ॥ १५१ ॥ अनाहारक जीवोंके अन्तरकी प्ररूपणा कार्मणकाययोगियों के समान है ॥ १५१ ॥ ॥ एक जीवकी अपेक्षा अन्तर समाप्त हुआ ॥ ३ ॥ -039300 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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