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________________ ३८८] छक्खंडागमे खुद्दाबंधो [ २, ३, १११ उक्त संयत आदि जीवोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ १०९ ॥ तथा उनका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्ध पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण काल तक होता है ॥ ११० ॥ सुहुमसांपराइयसुद्धिसंजद-जहाक्खादविहारसुद्धिसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ १११॥ सूक्ष्मसाम्परायिक-शुद्धिसंयतों और यथाख्यात-विहार-शुद्धिसंयतोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ १११॥ उवसमं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहत्तं ॥ ११२ ॥ उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्ट देसूणं ॥ ११३ ॥ उपशमकी अपेक्षा सूक्ष्मसाम्परायिक और यथाख्यात-शुद्धिसंयतोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥११२॥ तथा उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्थ पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण काल तक होता है ॥ ११३ ॥ खवगं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं ॥ ११४ ॥ क्षपककी अपेक्षा सूक्ष्मसाम्परायिक और यथाख्यात-विहार-शुद्धिसंयतोंका अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥ ११४ ॥ असंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि १ ॥११५ ॥ असंयतोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ११५ ॥ जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ॥ ११६ ॥ उक्कस्सेण पुन्चकोडी देसूणं ॥ ११७ ॥ असंयतोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ ११६ ॥ तथा उनका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पूर्वकोटि मात्र होता है ॥ ११७ ॥ दंसाणुवादेण चक्खुदंसणीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ ११८ ॥ दर्शनमार्गणाके अनुसार चक्षुदर्शनी जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ११८ ॥ जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं ॥ ११९ ॥ उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियढें ॥ १२० ॥ चक्षुदर्शनी जीवोंका जघन्य अन्तर क्षुद्रभवग्रहण मात्र होता है ॥ ११९ ।। तथा उनका उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अनन्त काल तक होता है ॥ १२० ॥ अचक्खुदंसणीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि १ ॥ १२१ ।। अचक्षुदर्शनी जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ १२१ ।। णत्थि अंतरं, णिरंतरं ॥ १२२ ॥ अचक्षुदर्शनी जीवोंका अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥ १२२ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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