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________________ . २, ३, ४९ एगजीवेण अंतराणुगमे इंदियमग्गणा [ ३८३ बादरएइंदिय-पज्जत्त-अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ ३८ ॥ बादर एकेन्द्रिय, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त और बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ३८ ॥ जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं ॥ ३९ ॥ उक्कस्सेण असंखेज्जा लोगा ॥ ४० ॥ उक्त एकेन्द्रिय जीवोंका अन्तर कमसे कम क्षुद्रभवग्रहण मात्र काल तक होता है ॥३९॥ तथा अधिकसे अधिक वह असंख्यात लोक प्रमाण काल तक होता है ॥ ४० ॥ सुहुमेइंदिय-पज्जत्त-अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥ ४१ ॥ _सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ४१ ॥ ____ जहण्णण खुद्दाभवग्गहणं ॥ ४२ ॥ उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेजदिभागो असंखेज्जासंखेज्जाओ ओसप्पिणी-उस्सप्पिणीओ ॥ ४३ ।। . सूक्ष्म एकेन्द्रिय व उनके पर्याप्त और अपर्याप्त जीवोंका अन्तर कमसे कम क्षुद्रभवग्रहण काल तक होता है ॥ ४२ ॥ तथा अविकसे अधिक वह अंगुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल तक होता है ॥ ४३ ।। बीइंदिय-तीइंदिय-चउरिंदिय-पंचिंदियाणं तस्सेव पज्जत्त-अपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि १ ॥४४॥ द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवोंका तथा उन्हींके पर्याप्त और अपर्याप्त जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥ ४४ ॥ जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं ॥४५॥ उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्ट । उक्त द्वीन्द्रियादि जीवोंका अन्तर कमसे कम क्षुद्रभवग्रहण काल तक होता है ॥ ४५ ॥ तथा अधिकसे अधिक वह असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अनन्त काल तक होता है ॥ ४६॥ कायाणुवादेण पुढविकाइय-आउकाइय-तेउकाइय-चाउकाइय-बादर-सुहुम-पज्जत्तअपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ॥४७॥ कायमार्गणाके अनुसार पृथिवीकायिक, अप्कायिक, तेजकायिक, वायुकायिक, तथा उन्हींके बादर और सूक्ष्म एवं पर्याप्त और अपर्याप्त जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? ॥४७॥ जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं ॥४८॥ उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियढें । उक्त पृथिवीकायिक आदि जीवोंका अन्तर कमसे कम क्षुद्रभवग्रहण काल तक होता है ॥४८॥ तथा अधिकसे अधिक वह असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अनन्त काल तक होता है ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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