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________________ २, २, १२६] एगजीणेण कालाणुगमे वेदमग्गणा [३७१ जीव पुरुषवेदी कितने काल रहते हैं ? ॥ ११७ ॥ जहण्णण अंतोमुहुत्तं ॥ ११८ ॥ जीव पुरुषवेदी कमसे कम अन्तर्मुहूर्त काल तक रहते हैं ॥ ११८ ॥ कोई जीव पुरुषवेदके साथ उपशमश्रेणीपर चढ़कर अपगतवेदी हुआ। तत्पश्चात् वहांसे उतरता हुआ वेदयुक्त होकर पुरुषवेदी हुआ और सर्व जघन्य अन्तर्मुहूर्त काल तक उक्त वेदके साथ रहा । फिर वह दुवारा उपशमश्रेणीपर चढ़कर अपगतवेदी हो गया। इस प्रकार पुरुषवेदका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त मात्र प्राप्त होता है। उक्कस्सेण सागरोवमसदपुधत्तं ।। ११९ ॥ अधिकसे अधिक वे सागरोपमशतपृथक्त्व काल तक पुरुषवेदी रहते हैं ॥ ११९ ॥ णqसयवेदा केवचिरं कालादो होंति ? ॥ १२० ॥ जीव नपुंसकवेदी कितने काल रहते हैं ? ॥ १२० ॥ जहण्णेण एगसमओ ॥ १२१ ॥ जीव नपुंसकवेदी कमसे कम एक समय रहते हैं ॥ १२१ ॥ नपुंसकवेदका यह जघन्य काल उपशमश्रेणीसे उतरते हुए जीवके पाया जाता है । उकस्सेण अणंतकालमसंखेजपोग्गलपरियट्ट ।। १२२ ॥ जीव नपुंसकवेदी अधिकसे अधिक असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अनन्त काल तक रहते हैं ॥ १२२ ॥ अवगदवेदा केवचिरं कालादो होंति ? ॥ १२३ ॥ जीव अपगतवेदी कितने काल रहते हैं ? ॥ १२३ ॥ उवसमं पडुच्च जहण्णेण एगसमओ ॥१२४ ॥ जीव अपगतवेदी उपशमककी अपेक्षा कमसे कम एक समय रहते हैं ॥ १२४ ॥ कोई जीव उपशमश्रेणीपर चढ़कर अपंगतवेदी हुआ और एक समय मात्र अपगतवेदी रहकर द्वितीय समयमें मरा व सवेद हो गया। इस प्रकार अपगतवेदका जघन्य काल एक समय मात्र प्राप्त हो जाता है। उक्कस्सेण अतोमुहुत्तं ॥ १२५ ॥ जीव अपगतवेदी अधिकसे अधिक अन्तर्मुहूर्त काल तक रहते हैं ॥ १२५ ॥ खवगं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ।। १२६ ॥ जीव अपगतवेदी क्षपककी अपेक्षा कमसे कम अन्तर्मुहूर्त काल तक रहते हैं ॥ १२६ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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