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________________ ३२८] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [ १, ९-९, ११९ तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टि संख्यात वर्षकी आयुवाले तिर्यंच तिर्यंच पर्यायके साथ मर करके कितनी गतियोंमें जाते हैं ? ॥ ११८ ॥ तिण्णि गदीओ गच्छंति-तिरिक्खगदि मणुसगर्दि देवगदि चेदि ॥ ११९ ॥ उपर्युक्त तिथंच जीव तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति इन तीन गतियोंमें जाते हैं । तिरिक्खेसु गच्छंता एइंदिय-पंचिदिएसु गच्छंति, णो विगलिदिएसु ।। १२० ।। तिर्यंचोंमें जाते हुए वे एकेन्द्रिय और पंचेन्द्रियोंमें जाते हैं, विकलेन्द्रियोंमें नहीं जाते ॥ एइंदिएसु गच्छंता बादरपुढवीकाइय-बादरआउकाइय-बादरवणप्फइकाइय-पत्तेयसरीरपज्जत्तएसु गच्छंति, णो अपज्जत्तेसु ॥ १२१ ॥ एकेन्द्रियोंमें जाते हुए वे बादर पृथिवीकायिक, बादर जलकायिक और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्तकोंमें ही जाते हैं; अपर्याप्तकोंमें नहीं जाते ॥ १२१॥ पंचिंदिएसु गच्छंता सण्णीसु गच्छंति, णो असण्णीसु ॥ १२२ ॥ पंचेन्द्रिय तिर्यंचोंमें जाते हुए वे संज्ञी तिर्यंचोंमें जाते हैं, असंज्ञियोंमें नहीं जाते ॥१२२॥ सण्णीसु गच्छंता गब्भोवतंतिएसु गच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु ॥ १२३ ॥ संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंचोंमें जाते हुए वे गर्भजोंमें जाते हैं, सम्मूर्च्छनोंमें नहीं जाते ।। १२३॥ गम्भोवकंतिएसु गच्छंता पज्जत्तएसु गच्छंति, णो अपज्जत्तएसु ॥ १२४ ॥ गर्भज संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंचोंमें जाते हुए वे पर्याप्तकोंमें जाते हैं, अपर्याप्तकोंमें नहीं जाते ॥ पज्जत्तएसु गच्छंता संखेजवासाउएसु वि गच्छंति असंखेजवासाउवेसु वि ॥१२५ पर्याप्त गर्भज संज्ञी पंचेन्द्रियोंमें जाते हुए वे संख्यात वर्षकी आयुवाले जीवोंमें भी जाते हैं और असंख्यात वर्षकी आयुवालोंमें भी जाते हैं ॥ १२५॥ मणुसेसु गच्छंता गब्भोवकंतिएसु गच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु ॥ १२६ ॥ मनुष्योंमें जानेवाले संख्यातवर्षायुष्क सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच गर्भज मनुष्योंमें ही जाते हैं, सम्मूर्च्छनोंमें नहीं जाते ॥ १२६ ॥ गब्भोवतंतिएसु गच्छंता पज्जत्तएसु गच्छंति, णो अपज्जत्तएसु ॥ १२७॥ गर्भज मनुष्योंमें जाते हुए वे पर्याप्तकोंमें जाते हैं, अपर्याप्तकोंमें नहीं जाते ॥ १२७॥ पज्जत्तएसु गच्छंता संखेज्जवासाउएसु वि गच्छंति असंखेज्जवासाउएसु वि गच्छति ॥ १२८ ॥ पर्याप्तक गर्भज मनुष्योंमें जाते हुए वे संख्यात वर्षकी आयुवाले मनुष्योंमें भी जाते हैं और असंख्यात वर्षकी आयुवाले मनुष्योंमें भी जाते हैं ॥ १२८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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