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________________ जीवट्ठाण - चूलियाए पढमसम्मत्तुप्पत्तिकारणपरूपणा एवं जाव उरिम उवरिमगेवज्जविमाणवासियदेवा ति ।। ३५ ।। इस प्रकार से उपरिम- उपरिम ग्रैवेयकविमानवासी देवों तक देव प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ॥ ३५ ॥ देवामिच्छा कहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेति ? ॥ ३६ ॥ देव मिथ्यादृष्टि कितने कारणोंसे प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ॥ ३६ ॥ चदुहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेति - केई जाइस्सरा केई सोऊण केई जिणमहिमं दडूण केई देविद्धिं दङ्गूण ।। ३७ ।। १, ९-९, ४२ ] देव मिथ्यादृष्टि चार कारणोंसे प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं- कितने ही जातिस्मरणसे, कितने ही धर्मोपदेशको सुनकर, कितने ही जिनमहिमाको देखकर और कितने ही ऊपर के देवोंकी ऋद्धिको देखकर उसे उत्पन्न करते हैं ॥ ३७ ॥ [ ३१९ एवं भवणवासिय पहुड जाव सदार- सहस्सारकप्पवासियदेवाति ।। ३८ ॥ इस प्रकार भवनवासी देवोंसे लगाकर शतार - सहस्रार तकके कल्पवासी देव उपर्युक्त चार कारणोंके द्वारा प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ॥ ३८ ॥ आणद्-पाणद-आरण-अच्युदकप्पवासि यदेवेसु मिच्छादिट्ठी दिहि कारणेहिं पढमसम्मत्तमुप्पादेति ॥ ३९ ॥ आनत, प्राणत, आरण और अच्युत कल्पोंके निवासी देवोंमें मिथ्यादृष्टि देव कितने कारणोंसे प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ? ॥ ३९ ॥ तीहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेंति - केई जाइस्सरा केई सोऊण केई जिणमहिमं दहूण ॥ ४० ॥ पूर्वोक्त आनतादि चार कल्पोंके देव तीन कारणोंसे प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैंकितने ही जातिस्मरणसे, कितने ही धर्मोपदेशको सुनकर और कितने ही जिनमहिमाको देखकर उसे उत्पन्न करते हैं ॥ ४० ॥ ववज्जविमाणवासियदेवेसु मिच्छादिट्ठी कदिहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेति ? ॥ ४१ ॥ नौ विमानवासी देवोंमें मिथ्यादृष्टि देव कितने कारणोंसे प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ? ॥ ४१ ॥ दोहि कारणेहि पढसम्मत्तमुप्पादेति - केई जाइस्सरा केई सोऊण ॥ ४२ ॥ विमानवासी मिथ्यादृष्टि देव दो कारणोंसे प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैंकितने ही जातिस्मरणसे और कितने ही धर्मोपदेशको सुनकर ॥ ४२ ॥ नौ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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