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________________ छक्खंडागमे जीवद्वाणं केई जाइस्सरा केई सोऊण केई वेदना हिभूदा || ८ | कितने ही नारकी जीव जातिस्मरणसे, कितने ही धर्मोपदेशको सुनकर और कितने ही वेदना से अभिभूत होकर प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ॥ ८ ॥ ३१६ ] एवं तिसु उवरिमासु पुढवी रइया || ९ || इस प्रकार ऊपरकी तीन पृथिवियों में नारकी जीव उपर्युक्त तीन कारणोंके द्वारा प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ॥ ९ ॥ चसु मासु पुढवीसु णेरड्या मिच्छाइट्ठी कदिहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेति ? ॥ १० ॥ नीचेकी चार पृथिवियोंमें नारकी मिथ्यादृष्टि जीव कितने कारणोंसे प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ? ॥ १० ॥ [ १, ९-९, ८ दोहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेति ॥ ११ ॥ नीचेकी चार पृथिवियोंमें नारकी मिथ्यादृष्टि जीव दो कारणोंसे प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ॥ ११ ॥ hi जास्सरा के वेयणाहिभूदा ॥ १२ ॥ उनमें कितने ही जीव जातिस्मरणसे और कितने ही वेदनासे अभिभूत होकर प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ॥ १२ ॥ चूंकि नीचेकी चार पृथिवियोंमें देवोंका जाना सम्भव नहीं है, अत एव वहां धर्मश्रवणके विना शेष दो ही कारणोंसे नारकी जीव प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं । तिरिक्खमिच्छाइट्ठी पढमसम्मत्तमुप्पादेति ॥ १३ ॥ तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं ॥ १३ ॥ उप्पादेंता कम्हि उप्पादेंति ? ॥ १४ ॥ प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेवाले तिर्यंच उसे किस अवस्था में उत्पन्न करते हैं ? ॥ १४ ॥ पंचिदिएस उप्पादेति णो एइंदिय - विगलिंदिए । १५ ।। तिर्यंच जीव पंचेन्द्रियोंमें ही प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं, एकेन्द्रियों और विकले - न्द्रियोंमें उस नहीं उत्पन्न करते ॥ १५ ॥ पंचिदिएस उप्पादेंता सण्णीसु उप्पादेति णो असण्णी ।। १६ ।। पंचेंन्द्रियोंमें भी प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेवाले तिर्यंच जीव संज्ञी जीवों में ही उसे उत्पन्न करते हैं, न कि असंज्ञियोंमें ॥ १६ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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