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________________ ३१२] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [ १,९-८, ४ सो पुण पंचिंदिओ सण्णी मिच्छाइट्ठी पज्जत्तओ सव्वविसुद्धो ॥ ४॥ वह प्रथमोपशम सम्यक्त्वको प्राप्त करनेवाला जीव पंचेन्द्रिय, संज्ञी, मिथ्यादृष्टि, पर्याप्त और सर्वविशुद्ध होता है ॥ ४ ॥ एकेन्द्रियोंको आदि लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्यन्त चूंकि सम्यक्त्वके ग्रहणके योग्य परिणाम सम्भव नहीं हैं, अतएव सूत्रमें 'पंचिंदिओ' पदके द्वारा उनका निषेध कर दिया गया है । सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि और वेदकसम्यग्दृष्टि जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्वको नहीं प्राप्त करते हैं, इसीलिये सूत्रमें — मिथ्यादृष्टि ' कहकर उनका भी प्रतिषेध किया गया है। यद्यपि उपशमश्रेणिके चढ़नेके अभिमुख हुआ वेदकसम्यग्दृष्टि जीव उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करता है, परन्तु उसके सम्यक्त्वपूर्वक उत्पन्न होने के कारण उसे प्रथमोपशम सम्यक्त्व नहीं कहा जाता है । इसलिये प्रथमोपशम सम्यक्त्वको प्राप्त करनेवाला मिथ्यादृष्टि जीव ही होता है और वह भी पर्याप्त अवस्थामें ही होता है, न कि अपर्याप्त अवस्थामें; यह इस सूत्रका अभिप्राय समझना चाहिये । एदेसिं चेव सव्वकम्माणं जाधे अंतोकोडाकोडिद्विदिं ठवेदि संखेज्जेहि सागरोवमसहस्सेहि ऊणियं ताधे पढमसम्मत्तमुप्पादेदि ॥५॥ ___ जिस समय जीव इन्हीं सब कर्मोकी संख्यात हजार सागरोपमोंसे हीन अन्तःकोड़ाकोडि सागरोपम प्रमाण स्थितिको स्थापित करता है उस समय वह प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है ॥ ५ ॥ पढमसम्मत्तमुप्पादेतो अंतोमुहुत्तमोह दि ॥ ६ ॥ प्रथमोपशम सम्यक्त्वको उत्पन्न करता हुआ सातिशय मिथ्यादृष्टि जीव अन्तर्मुहूर्त काल तक हटाता है, अर्थात् अन्तरकरण करता है ॥ ६॥ इसका अभिप्राय यह है कि प्रथमोपशम सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेवाला अनादि मिथ्यादृष्टि जीव अधःकरण और अपूर्वकरण परिणामोंके कालको विताकर जब वह अनिवृत्तिकरण परिणामों सम्बन्धी कालके भी संख्यात बहुभागको विता देता है तब वह मिथ्यात्व प्रकृतिके अन्तरकरणको करता है। विवक्षित कर्मकी अधःस्तन और उपरिम स्थितियोंको छोड़कर मध्यकी अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थितियोंके निषेकोंका परिणामविशेषके द्वारा अभाव करनेका नाम अन्तरकरण है । इस अन्तरकरणको करता हुआ वह उसके प्रारम्भ करनेके समयसे पूर्वमें उदयमें आनेवाली मिथ्यात्व कर्मकी अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थितिको लांघकर उसके ऊपरकी अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थितिके निषेकोंको उत्कीरण कर उनमें से कुछको प्रथमस्थिति (अन्तरकरणसे नीचेकी अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थिति) और कुछको द्वितीय स्थिति (अन्तरकरणसे ऊपरकी अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थिति ) में क्षेपण करता है। इस प्रकार वह मिथ्यात्वकी अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थितियोंके निषेकोंका अभाव कर देता है। ओहद्देदृण मिच्छत्तं तिण्णिभागं करेदि सम्मत्तं मिच्छत्तं सम्मामिच्छत्तं ॥ ७ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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