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________________ १, ९-७, १७] जीवट्टाण-चूलियाए जहण्णट्ठिदिपरूपणा [ ३०७ अंतोमुहुत्तमाबाधा ॥ ७॥ उक्त निद्रानिद्रादि छह कर्मप्रकृतियोंका जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है। आबाधूणिया कम्मट्टिदी कम्मणिसेओ ॥ ८ ॥ उक्त निद्रानिद्रादि छह कर्मोकी आबाधाकालसे हीन जघन्य कर्मस्थिति प्रमाण उनका कर्मनिषेक होता है ।। ८ ।। सादावेदणीयस्स जहण्णओ हिदिबंधो वारस मुहुत्ताणि ॥ ९ ॥ सातावेदनीयका जघन्य स्थितिबन्ध बारह मुहूर्त मात्र होता है ॥९॥ अंतोमुहुत्तमाबाधा ॥१०॥ सातावेदनीय कर्मका जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ १० ॥ आबाधूणिया कम्माट्ठिदी कम्मणिसेओ ॥ ११ ॥ सातावेदनीय कर्मकी आबाधाकालसे हीन जघन्य कर्मस्थिति प्रमाण उसका कर्मनिषक होता है ॥ ११॥ मिच्छत्तस्स जहण्णगो विदिबंधो सागरोवमस्स सत्त सत्तभागा पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागेण ऊणया ॥ १२ ॥ मिथ्यात्व कर्मका जघन्य स्थितिबन्ध पल्योपमके असंख्यातवें भागसे हीन सागरोपमके सात बटे सात भाग (७ ) प्रमाण होता है ॥ १२ ॥ अंतोमुहुत्तमावाधा ॥१३॥ मिथ्यात्व कर्मका जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ १३ ॥ आबाघृणिया कम्महिदी कम्मणिसेओ ॥१४॥ मिथ्यात्व कर्मकी आबाधाकालसे हीन जघन्य कर्मस्थिति प्रमाण उसका कर्मनिषेक होता है । बारसण्हं कसायाणं जहण्णओ द्विदिवंधो सागरोवमस्स चत्तारि सत्तभागा पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागेण ऊणया ॥ १५ ॥ अनन्तानुबन्धी क्रोधादि बारह कषायोंका जघन्य स्थितिबन्ध पल्योपमके असंख्यातवें भागसे हीन सागरोपमके चार बटे सात भाग ( ४ ) प्रमाण होता है ॥ १५॥ अंतोमुहुत्तमाबाधा ॥१६॥ अनन्तानुबन्धी क्रोधादि बारह कषायोंका जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है। आबाधूणिया कम्मद्विदी कम्मणिसेगो ॥१७॥ उक्त बारह कषायोंकी आबाधाकालसे हीन जघन्य कर्मस्थिति प्रमाण उनका कर्मनिषेक होता है ॥ १७ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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