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________________ जीवा - चूलियाए विदिओ महादंडओ ४. चउत्थी चूलिया तत्थ इमो विदियो महादंडओ कादव्वो भवदि ॥ १ ॥ उन तीन महादण्डकोंमेंसे यह द्वितीय महादण्डक करने योग्य है ॥ १ ॥ १, ९-४, २ ] पंचहं णाणावरणीयाणं णवण्हं दंसणावरणीयाणं सादावेदणीयं मिच्छत्तं सोलसहं कसायाणं पुरिसवेद-हस्स-रदि-भय- दुगुंछा । आउअं च ण बंधदि । मणुसगदिपंचिदियजादि - ओरालिय- तेजा - कम्मइय सरीर-समचउरससंठाणं ओरालियसरीरअगोवंगं वज्जरिसहसंघडणं वण्ण-गंध-रस - फासं मणुसग दिपाओग्गाणुपुथ्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघादउस्सास-पसत्थविहायगदी तस - बादर- पज्जत्त- पत्तेयसरीर-थिर- सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज्जजसकित्तिणिमिण-उच्चागोदं पंचण्हमंतराइयाणं एदाओ पयडीओ बंधदि पढमसम्मत्ता हि मुहो अध सत्तमा पुढवीए णेरइयं वज्ज देवो वा णेरइओ वा || २ || [ २९९ प्रथमोपशम सम्यक्त्वके अभिमुख हुआ देव और नीचे सातवीं पृथिवीके नारकीको छोड़कर अन्य नारकी जीव पांचों ज्ञानावरणीय, नवों दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, मिथ्यात्व अनन्तानुबन्धी क्रोध आदि सोलह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय और जुगुप्सा; इन प्रकृतियोंको बांधता है; किन्तु आयु कर्मको नहीं बांधता है। मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, औदारिकशरीरअंगोपांग, वज्रऋषभनाराचसंहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुअलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुखर, आदेय, यशःकीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पांचों अन्तराय; इन प्रकृतियोंको बांधता है ॥ २ ॥ ' आउगं च ण बंधदि ' इस वाक्य में प्रयुक्त समुच्चयार्थक 'च' शब्द से उक्त चार आयुओंके साथ असातावेदनीय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, अरति, शोक, नरकगति, तिर्यग्गति, देवगति, एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, आहारकशरीर, समचतुरस्त्रसंस्थानको छोड़कर शेष पांच संस्थान, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, आहारक शरीरांगोपांग, वज्रऋषभनाराचसंहनको छोड़कर शेष पांच संहनन, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अप्रशस्त विहायोगति, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारणशरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशः कीर्ति, नीचगोत्र और तीर्थंकर; इन प्रकृतियोंको भी ग्रहण करना चाहिये। इन सब प्रकृतियोंको प्रथमोपशमसम्यक्त्वके अभिमुख हुआ देव और सातवीं पृथिवीके नारकीको छोड़कर अन्य नारकी जीव नहीं बांधते हैं । ॥ चौथी चूलिका समाप्त हुई || ४ || Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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