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________________ छक्खंडागमे जीवद्वाणं ३. तदिया चूलिया इदाणिं पढमसम्मत्ताभिमुहो जाओ पयडीओ बंधदि ताओ पयडीओ कित्तसाम ॥ १ ॥ २९८ ] अत्र प्रथमोपशम सम्यक्त्वके ग्रहण करने के अभिमुख हुआ जीव जिन प्रकृतियोंको बांधता है उन प्रकृतियोंको कहेंगे ॥ १ ॥ पंचहं णाणावरणीयाणं णवण्हं दंसणावरणीयाणं सादावेदणीयं मिच्छत्तं सोलसण्हं कसायाणं पुरिसवेद-हस्स-रदि-भय- दुगुंछा । आउगं च ण बंधदि । देवगदि-पंचिंदियजादिवेउब्विय-तेजा-कम्मइयसरीरं समचउरससंठाणं वेउव्वियअंगोवंगं वण्ण-गंध-रस- फासं देवरादिपाओग्गाणुपुच्ची अगुरुअलहुअ उवघाद- परघाद- उस्सास-पसत्थविहायगदि-तस बादर-पञ्जतपत्तेय सरीर-थिर-सुभ सुभग- सुस्सर-आदेज्ज-जसकित्तिणिमिण-उच्चागोदं पंचण्हमंतराइयाणमेदाओ यडीओ बंधदि पढमसम्मत्ताभिमुो सण्णि-पंचिदियतिरिक्खो वा मणुसो वा ॥ २ प्रथमोपशम सम्यक्त्वके ग्रहण करनेके अभिमुख हुआ संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच अथवा मनुष्य पांचों ज्ञानावरणीय, नौ दर्शनावरणीय, साता वेदनीय, मिथ्यात्व अनन्तानुबन्धी क्रोध आदि सोलह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय और जुगुप्सा, इन प्रकृतियोंको बांधता है । आयु कर्मको नहीं बांधता है । देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरांगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुअलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पांचों अन्तराय; इन प्रकृतियोंको बांधता है ॥ २ ॥ [ १, ९-३, १ वह जिस प्रकार वह आयु कर्मको नहीं बांधता है उसी प्रकार वह उस चार प्रकारके आयु कर्मके साथ असातावेदनीय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, अरति, शोक, नरकगति, तिर्यग्गति, मनुष्यगति, एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, आहारकशरीर, न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान, स्वातिसंस्थान, कुब्जकसंस्थान, वामनसंस्थान, हुण्डकसंस्थान, औदारिकशरीरांगोपांग, आहारकशरीरांगोपांग, छहों संहनन, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारणशरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशः कीर्ति, तीर्थंकर और नीचगोत्र इन प्रकृतियोंको भी विशुद्धतम परिणाम होनेके कारण नहीं बांधता है। तीर्थंकर और आहारकद्विकके न बांधने का कारण सम्यक्त्व और संयमका अभाव है । यह अभिप्राय सूत्रमें 'आउगं च ण बंधदि ' यहां प्रयुक्त ' च ' शब्द के ग्रहणसे समझना चाहिये । ॥ तीसरी चूलिका समाप्त हुई || ३ || Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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