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________________ १,९-१, २८ ] जीवट्ठाण-चूलियाए पयडिसमुक्त्तिणं [ २६९ उपघात शब्दका अर्थ है आत्मवात । जिस कर्मके उदयसे ऐसे शरीरके अवयव हों कि जिनके निमित्तसे स्वयंका ही घात होता हो उसे उपघात नामकर्म कहते हैं। जैसे बारहसिंगाके सींग आदि । पर जीवोंके घातको परघात कहते हैं । जिस कर्मके उदयसे शरीरमें परके घातके कारणभूत पुद्गल उत्पन्न होते हैं वह परघात नामकर्म कहलाता है । जैसे- सांपकी दाढोंमें विष आदि । सांस लेनेका नाम उच्छ्वास है । जिस कर्मके उदयसे जीव उच्छ्वास और निःश्वासरूप कार्यके उत्पादनमें समर्थ होता है उस कर्मकी उच्छ्वास संज्ञा है। जिस नामकर्मके उदयसे जीवके शरीरमें आताप होता है उसे आतप नामकर्म कहते हैं । आतपसे यहां अभिप्राय उष्णतासे संयुक्त प्रकाशका है। इस नामकर्मका उदय सूर्यमण्डलगत पृथिवीकायिक जीवोंमें पाया जाता है । उद्योतन अर्थात् चमकनेको उद्योत कहते हैं । जिस कर्मके उदयसे जीवके शरीरमें उद्योत उत्पन्न होता है वह उद्योत नामकर्म कहलाता है । इसका उदय चन्द्रबिम्बगत पृथिवीकायिक जीवोंके एवं जुगुनू आदिके पाया जाता है। विहायस् नाम आकाशका है । जिन कर्मस्कन्धोंके उदयसे जीवका आकाशमें गमन होता है उनको. विहायोगति नामकर्म कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे जीवोंके त्रसपना (द्वीन्द्रियादि पर्याय ) होता है उस कर्मकी त्रस संज्ञा है। जिस कर्मके उदयसे जीत्र स्थावरपनेको प्राप्त होता है अर्थात् एकेन्द्रियोंमें जन्म लेता है उसका नाम स्थावर नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे जीव बादरकायवालोंमें उत्पन्न होता है उस कर्मकी बादर संज्ञा है । जिन जीवोंका शरीर दूसरे जीवोंको बाधा पहुंचाता है तथा स्वयं भी दूसरेके द्वारा बाधाको प्राप्त होता है वे बादर कायवाले कहलाते हैं । जिस कर्मके उदयसे जीव सूक्ष्मताको प्राप्त होता है उस कर्मकी सूक्ष्म संज्ञा है। इस कर्मके उदयसे जीवको ऐसा शरीर प्राप्त होता है कि जो न तो दूसरे जीवोंको रोक सकता है और न उनके द्वारा स्वयं भी रोका जा सकता है । जिस कर्मके उदयसे जीव पर्याप्त होता है उस कर्मकी पर्याप्त यह संज्ञा है । जिस कर्मके उदयसे जीव पर्याप्तियोंको पूरा करनेके लिए समर्थ नहीं होता है उस कर्मकी अपर्याप्त यह संज्ञा है । जिस कर्मके उदयसे शरीर एक जीवके ही उपभोगका कारण होता है उसे प्रत्येकशरीर नामकर्म कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे जीवके बहुत जीवोंके उपभोगका कारणभूत शरीर प्राप्त होता है उसका नाम साधारणशरीर नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे रस, रुधिर, मेदा, मज्जा, अस्थि, मांस और शुक्र; इन सात धातुओंकी स्थिरता होती है वह स्थिर नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे इन सात धातुओंका परिणमन होता है वह अस्थिर नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे अंगों और उपांगोंके शुभपना ( रमणीयता ) होता है वह शुभ नामकर्म है। जिस नामकर्मके उदयसे अंग और उपांगोंके अशुभपना होता है वह अशुभ नामकर्म कहलाता है। जिसके उदयसे स्त्री और पुरुषोंके सौभाग्य उत्पन्न होता है वह सुभग नामकर्म तथा जिसके उदयसे उन स्त्री और पुरुषोंके दुर्भगभाव उत्पन्न होता है वह दुर्भग नामकर्म कहलाता है । जिस कर्मके उदयसे जीवोंका स्वर मधुर होता है वह सुस्वर नामकर्म कहलाता है। जिस कर्मके उदयसे जीवका स्वर गधा या ऊंट आदिके समान निन्द्य होता है वह दुःस्वर नामकर्म कहलाता है। आदेयताका अर्थ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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