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________________ २६८] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [१, ९-१, २८ सरीरणाम साधारणसरीरणाम थिरणामं अथिरणामं सुहणामं असुहणामं सुभगणामं दूभगणामं सुस्सरणामं दुस्सरणामं आदेज्जणामं अणादेज्जणामं जसकित्तिणामं अजसकित्तिणामं णिमिणणामं तित्थयरणामं चेदि ॥२८॥ गति नामकर्म, जाति नामकर्म, शरीर नामकर्म, शरीरबन्धन नामकर्म, शरीरसंघात नामकर्म, शरीरसंस्थान नामकर्म, शरीरअंगोपांग नामकर्म, शरीरसंहनन नामकर्म, वर्ण नामकर्म, गन्ध नामकर्म, रस नामकर्म, स्पर्श नामकर्म, आनुपूर्वी नामकर्म, अगुरु-अलघु नामकर्म, उपघात नामकर्म, परघात नामकर्म, उच्छ्वास नामकर्म, आताप नामकर्म, उद्योत नामकर्म, विहायोगति नामकर्म, त्रस नामकर्म, स्थावर नामकर्म, बादर नामकर्म, सूक्ष्म नामकर्म, पर्याप्त नामकर्म, अपर्याप्त नामकर्म, प्रत्येकशरीर नामकर्म, साधारणशरीर नामकर्म, स्थिर नामकर्म, अस्थिर नामकर्म, शुभ नामकर्म, अशुभ नामकर्म, सुभग नामकर्म, दुर्भग नामकर्म, सुस्वर नामकर्म, दुःस्वर नामकर्म, आदेय नामकर्म, अनादेय नामकर्म, यशःकीर्ति नामकर्म, अयशःकीर्ति नामकर्म, निर्माण नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म; ये नामकर्मकी ब्यालीस पिण्डप्रकृतियां हैं ॥ २८ ॥ जिसके उदयसे जीव दूसरे भवको प्राप्त होता है उसे गति नामकर्म कहते हैं। जिस कर्मस्कन्धके उदयसे जीवोंके सदृशता उत्पन्न होती है वह कर्मस्कन्ध जाति नामकर्म कहलाता है । जिस कर्मके उदयसे आहारवर्गणा, तैजसवर्गणा और कार्मणवर्गणाके पुद्गलस्कन्ध शरीरयोग्य परिणामोंसे परिणत होकर जीवके साथ सम्बद्ध होते हैं उसे शरीर नामकर्म कहते हैं। जिस नामकर्मके उदयसे शरीरके निमित्त आकर जीवके साथ सम्बद्ध हुए पुद्गलोंका परस्पर बन्ध होता है उसे शरीरबन्धन नामकर्म कहते हैं । जिसके द्वारा औदारिक आदि शरीररूप पुद्गलोंमें परस्पर एकमेक होकर छिद्ररहित एकरूपता की जाती है वह शरीरसंघात नामकर्म कहलाता है। जिन कर्मस्कन्धोंके उदयसे शरीरकी आकृति की जाती है उनको शरीरसंस्थान नामकर्म कहते हैं। जिस कर्मस्कन्धके उदयसे शरीरके अंग और उपांगोंकी निष्पत्ति होती है उस कर्मस्कन्धका नाम शरीरांगोपांग नामकर्म है। यहां दो पाद, दो हाथ, नितम्ब, पीठ, हृदय और शिर इन आठको अंग तथा शेष नाक व कान आदिकोंको उपांग समझना चाहिए। जिसके उदयसे हड्डियोंका परस्पर बन्धनविशेष होता है उसे शरीरसंहनन नामकर्म कहा जाता है । जिस कर्मके उदयसे जीवके शरीरमें वर्णकी उत्पत्ति होती है उसे वर्ण नामकर्म कहते हैं । इसी प्रकार गन्ध, रस और स्पर्श नामकर्मोका भी स्वरूप जान लेना चाहिये । जिस कर्मके उदयसे पूर्व और उत्तर शरीरोंके अन्तरालवर्ती एक, दो और तीन समयोंमें वर्तमान जीवके आत्मप्रदेशोंका विशिष्ट आकार होता है उसे आनुपूर्वी कहते हैं। इसके उदयसे विग्रहगतिमें वर्तमान जीवके पूर्व शरीररूप आकारका विनाश नहीं होता है । जिसके उदयसे शरीर न तो लोहपिण्डके समान भारी होता है कि जिससे नीचे गिर जाय और न रुईके समान हलका ही होता है कि जिससे ऊपर उड़कर चला जाय उसे अगुरु-अलघु नामकर्म कहते हैं | Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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