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________________ २.६२ ] . 'छक्खंडागमे जीवट्ठाणं । [१,९-१, १२ है उसे गोत्रकर्म समझना चाहिये ।। अंतरायं चेदि ॥१२॥ अन्तराय कर्म है ॥ १२ ॥ ' अन्तरम् एति इति अन्तरायः ' इस निरुक्तिके अनुसार जो पुद्गलस्कन्ध अपने बन्धकारणोंके द्वारा जीवके साथ सम्बन्धको प्राप्त होकर दान, लाभ, भोग और उपभोग आदिमें विघ्न करता है उसे अन्तराय कर्म जानना चाहिये । इस प्रकार आठ मूलप्रकृतियोंका निर्देश करके अब आगे उनके उत्तर भेदोंका निर्देश किया जाता है-- णाणावरणीयस्स कम्मस्स पंच पयडीओ ॥ १३ ॥ ज्ञानावरणीय कर्मकी पांच उत्तर प्रकृतियां हैं ॥ १३ ॥ आभिणिवोहियणाणावरणीयं सुदणाणावरणीयं ओहिणाणावरणीयं मणपज्जवणाणावरणीयं केवलणाणावरणीयं चेदि ॥ १४ ॥ आभिनिबोधिकज्ञानावरणीय, श्रुतज्ञानावरणीय, अवविज्ञानावरणीय, मनःपर्ययज्ञानावरणीय और केवलज्ञानावरणीय ये वे ज्ञानावरणीयकी पांच प्रकृतियां हैं ॥ १४ ॥ अभिमुख और नियमित अर्थके अवबोधको अभिनिबोध कहते हैं। यहां अभिमुखसे अभिप्राय स्थूल, वर्तमान और व्यवधानरहित अर्थोंका है । चक्षु इन्द्रियमें रूप, श्रोत्रेन्द्रियमें शब्द, घ्राणेन्द्रियमें गन्ध, रसना इन्द्रियमें रस, स्पर्शनेन्द्रियमें स्पर्श और नोइन्द्रिय ( मन ) में दृष्ट, श्रुत एवं अनुभूत पदार्थ नियमित हैं । इस प्रकारके अभिमुख और नियमित पदार्थोका जो बोध होता है वह अभिनिबोध कहलाता है । इस अभिनिबोधको ही यहां आभिनिबोधिकरूपसे ग्रहण किया गया है । वह आभिनिबोधिकज्ञान अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणाके भेदसे चार प्रकारका है । विषय ( बाह्य पदार्थ ) और विषयी ( इन्द्रियों ) के सम्बन्धके पश्चात् जो प्रथम ग्रहण होता है उसका नाम अवग्रह है । वह दो प्रकारका है- अर्थावग्रह और व्यंजनावग्रह । इनमें जो अप्राप्त अर्थको ग्रहण करता है वह अर्थावग्रह तथा जो प्राप्त अर्थको ग्रहण करता है वह व्यंजनावग्रह कहा जाता है । इनमें अप्राप्त अर्थका ग्रहण चक्षु इन्द्रियके द्वारा और प्राप्त अर्थका ग्रहण स्पर्शन आदि इन्द्रियोंके द्वारा होता है । अवग्रहके द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थके विषयमें जो आकांक्षारूप विशेष ज्ञान होता है उसका नाम ईहा है। जैसे — यह भव्य होना चाहिये ' इस प्रकारका ज्ञान । ईहाके द्वारा ग्रहण किये हुए पदार्थके विषयमें सन्देहको दूर करते हुए जो निश्चयात्मक ज्ञान होता है उसे अवाय कहते हैं। जैसे ' यह भव्य ही है । इस प्रकारका ज्ञान । जिस ज्ञानके निमित्तसे जीवमें कालान्तरमें भी अविस्मरणका कारणभूत संस्कार उत्पन्न होता है उसका नाम धारणा है । ये चारों ज्ञान बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अनुक्त, ध्रुव और इनके प्रतिपक्षी एक, एकविध, अक्षिप्र, निःसृत, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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