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________________ १, ८, ९४ ] अप्पाबहुगाणुगमे गदिमग्गणा [२३५ मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा ॥ ८४ ।। देवोंमें असंयतसम्यग्दृष्टियोंसे मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणित हैं ॥ ८४ ॥ असंजदसम्मादिद्विट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी ।।८५।। खइयसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा ॥ ८६ ॥ देवोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानमें उपशमसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं ॥ ८५ ॥ उनमें असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानवर्ती उपशमसम्यग्दृष्टियोंसे क्षायिकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित हैं ॥ ८६ ॥ वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा ॥ ८७ ॥ देवोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानमें क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंसे वेदकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित हैं ॥ ८७ ॥ भवणवासिय-वाण-तर-जोदिसियदेवा देवीओ सोधम्मीसाणकप्पवासियदेवीओ च सत्तमाए पुढवीए भंगो ॥ ८८ ॥ देवोंमें भवनवासी, वानव्यन्तर व ज्योतिष्क देव और इनकी देवियां, तथा सौधर्म-ऐशान कल्पवासिनी देवियां; इनके अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा सातवीं पृथिवीके अल्पबहुत्वके समान है ।। ८८ ॥ सोहम्मीसाण जाव सदार-सहस्सारकप्पवासियदेवेसु जहा देवगइभंगो ॥ ८९॥ सौधर्म-ईशान कल्पसे लेकर शतार-सहस्रार कल्प तक कल्पवासी देवोंमें अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा देवगति सामान्यके समान है ।। ८९ ॥ आणद जाव णवगेवज्जविमाणवासियदेवेसु सव्वत्थोवा सासणसम्मादिट्ठी॥९०॥ आनतसे लेकर नव प्रैवेयक विमानों तक विमानवासी देवोंमें सासादनसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं ॥ ९० ॥ सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा ॥ ९१॥ उक्त विमानवासी देवोंमें सासादनसम्यग्दृष्टियोंसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव संख्यातगुणित हैं । मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा ॥ ९२ ।। उनमें सम्यग्मिथ्यादृष्टियोंसे मिथ्यादृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं ॥ ९२ ॥ असंजदसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा ॥ ९३ ॥ उनमें मिथ्यादृष्टियोंसे असंयतसम्यग्दृष्टि देव संख्यातगुणित हैं ॥ ९३ ॥ असंजदसम्मादिट्ठिाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी ।। ९४ ॥ आनत कल्पसे लेकर नव ग्रैवेयक तक देवोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानमें उपशमसम्यग्दृष्टि देव सबसे कम हैं ॥ ९४ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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