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________________ १,७, ११] भावाणुगमे गदिमग्गणा [२१७ अनन्तानुबन्धिचतुष्टयके साथ मिथ्यात्व और सम्मग्मिथ्यात्व प्रकृतियोंके सर्वघाती स्पर्धकोंके तथा सम्यक्त्व प्रकृतिके देशघाती स्पर्धकोंके उदयाभावस्वरूप उपशमसे चूंकि औपशमिक सम्यक्त्वरूप असंयतसम्यग्दृष्टि भाव उत्पन्न होता है, इसलिये वह औपशमिक भाव है। इन्हीं प्रकृतियोंके सर्वथा क्षयसे चूंकि क्षायिक सम्यक्त्वरूप असंयतसम्यग्दृष्टि भाव उत्पन्न होता है, इसलिये वह क्षायिक भाव भी है। मिथ्यात्व व सम्यग्मिथ्यात्वके उदयक्षय और सद्वस्थारूप उपशमसे तथा सम्यक्त्व प्रकृतिके देशघाती स्पर्धकोंके उदयसे चूंकि वेदक सम्यक्त्वरूप असंयतसम्यग्दृष्टि भाव उत्पन्न होता है, अतएव वह क्षायोपशमिक भाव भी है। ओदइएण भावेण पुणो असंजदो ॥ ६ ॥ किन्तु असंयतसम्यग्दृष्टिका असंयतत्व परिणाम औदयिक भावसे है ॥ ६ ॥ कारण यह कि वह असंयतत्व भाव संयमघातक चारित्रमोहनीयके उदयसे होता है। यह असंयतत्व नीचेके तीन गुणस्थानोमें भी औदयिक ही है। संजदासंजद-पमत्त-अप्पमत्तसंजदा त्ति को भावो ? खओवसमिओ भावो ॥ ७॥ संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत ये कौन-से भाव हैं ? क्षायोपशमिक भाव हैं । संयतासंयत भाव चूंकि चार अनन्तानुबन्धी और चार अप्रत्याख्यानावरण इन आठके उदयक्षय व सद्वस्थारूप उपशमसे, चार प्रत्याख्यानावरण प्रकृतियोंके उदयसे, संज्वलनचतुष्कके देशघाती स्पर्धकोंके उदयसे तथा नौ नोकषायोंके यथासम्भव उदयसे उत्पन्न होता है। अतएव वह क्षायोपशमिक भाव है। इसी प्रकार प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत ये दोनों भाव अनन्तानुबन्धी आदि बारह कषायोंके उदयक्षय व सद्वस्थारूप उपशमसे, संज्वलनचतुष्कके देशघाती स्पर्धकोंके उदयसे तथा नौ नोकषायोंके यथासम्भव उदयसे चूंकि उत्पन्न होते हैं; अतएव वे भी क्षायोपशमिक भाव हैं। चदुण्हमुवसमा त्ति को भावो ? ओवसमिओ भावो ॥ ८ ॥ अपूर्वकरण आदि चारोंका उपशामक यह कौन-सा भाव है ? औपशमिक भाव है ॥८॥ चदुण्हं खवा सजोगिकेवली अजोगिकेवलि त्ति को भावो ? खइओ भावो ॥९॥ चारों क्षपक, सयोगिकेवली और अयोगिकेवली; यह कौन-सा भाव है ? क्षायिक भाव है ॥ आदेसेण गइयाणुवादेण णिरयगईए णेरइएसु मिच्छादिट्ठि त्ति को भावो ? ओदइओ भावो ॥ १० ॥ आदेशकी अपेक्षा गतिमार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें नारकियोंमें मिथ्यादृष्टि यह कौन-सा भाव है ? औदयिक भाव है ॥ १० ॥ सासणसम्माइहि त्ति को भावो ? पारिणामिओ भावो ।। ११ ॥ नारकियोंमें सासादनसम्यग्दृष्टि यह कौन-सा भाव है ? पारिणामिक भाव है ॥ ११.॥ छ.२८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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