SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 320
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १, ६, १८४ ] अंतराणुगमे वेदमग्गणा [१९५ उक्कस्सेण वासपुधत्तं ॥ १७५ ॥ नाना जीवोंकी अपेक्षा उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व प्रमाण होता है ॥ १७५ ॥ एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, जिरंतरं ॥ १७६ ॥ एक जीवकी अपेक्षा आहारकाययोगी और आहारमिश्रकाययोगियोंमें प्रमत्तसंयतोंका अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥ १७६ ॥ कम्मइयकायजोगीसु मिच्छादिट्ठि-सासणसम्मादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्टि-सजोगिकेवलीणं ओरालियमिस्सभंगो ॥ १७७ ॥ कार्मणकाययोगियोंमें मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और सयोगिकेवलियोंके अन्तरकी प्ररूपणा औदारिकमिश्रकाययोगियोंके समान है ॥ १७७ ॥ वेदाणुवादेण इत्थिवेदेसु मिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतर ॥ १७८ ।। वेदमार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदियोंमें मिथ्यादृष्टि जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ! नाना जीवोंकी अपेक्षा उनका अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥ १७८ ।। एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ।। १७९ ।। एक जीवकी अपेक्षा स्त्रीवेदी मिथ्यादृष्टि जीवोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है । उक्कस्सेण पणवण्ण पलिदोवमाणि देसूणाणि ॥ १८० ॥ एक जीवकी अपेक्षा स्त्रीवेदी मिथ्यादृष्टि जीवोंका उत्कृष्ट अन्तर कुछ ( पांच अन्तर्मुहूर्त ) कम पचवन पल्योपम मात्र होता है ।। १८० ॥ ___ सासणसम्मादिहि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च ओघं ।। १८१ ॥ स्त्रीवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा उनके अन्तरकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १८१ ॥ __ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो, अंतोमुहुत्तं ॥ १८२ ॥ एक जीवकी अपेक्षा स्त्रीवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका जघन्य अन्तर पत्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र तथा सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंका वह अन्तर जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है । उक्कस्सेण पलिदोवमसदपुधत्तं ।। १८३ ॥ एक जीवकी अपेक्षा स्त्रीवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंका उत्कृष्ट अन्तर पल्योपमशतपृथक्त्व मात्र होता है ॥ १८३ ।। असंजदसम्मादिटिप्पहुडि जाव अपमत्तसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy