SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 319
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १९४ ] छक्खंडागमे जीवद्वाणं [ १, ६, १६७ कारण यह है कि कपाटसमुद्घातसे रहित केवलियोंका कमसे कम एक समयके लिये अभाव पाया जाता है । उक्कस्सेण वासपुधत्तं ॥ १६७ ॥ नाना जीवोंकी अपेक्षा औदारिकमिश्रकाययोगी केवलियोंका उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व प्रमाण होता है ॥ १६७ ॥ एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं ।। १६८॥ एक जीवकी अपेक्षा औदारिकमिश्रकाययोगी केवली जिनोंका अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥ १६८ ॥ वेउब्बियकायजोगीसु चदुट्ठाणीणं मणजोगिभंगो ।। १६९ ॥ वैक्रियिककाययोगियोंमें आदिके चारों गुणस्थानवी जीवोंका अन्तर मनोयोगियोंके समान होता है ॥ १६९॥ __वेउब्बियमिस्सकायजोगीसु मिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ।। १७० ॥ वैक्रियिकमिश्रकाययोगियोंमें मिथ्यादृष्टियोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय मात्र अन्तर होता है ॥ १७० ॥ उक्कस्सेण बारस मुहुत्तं ॥ १७१ ॥ नाना जीवोंकी अपेक्षा वैक्रियिकमिश्रकाययोगी मिथ्यादृष्टियोंका उत्कृष्ट अन्तर बारह मुहूर्त मात्र होता है ॥ १७१ ॥ एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं ॥ १७२ ॥ एक जीवकी अपेक्षा वैक्रियिकमिश्रकाययोगी मिथ्यादृष्टियोंका अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥ १७२ ॥ सासणसम्मादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीणं ओरालियमिस्सभंगो ॥ १७३ ।। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोंके अन्तरकी प्ररूपणा औदारिकमिश्रकाययोगियोंके समान है ॥ १७३ ॥ __ आहारकायजोगि-आहारमिस्सकायजोगीसु पमत्तसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ॥ १७४ ॥ ___ आहारकाययोगी और आहारमिश्रकाययोगी जीवोंमें प्रमत्तसंयतोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय मात्र अन्तर होता है ॥ १७४ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org -
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy