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________________ १, ६, १४८ ] अंतराणुगमे कायमग्गणा अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा उनके अन्तरकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो, अंतोमुहुत्तं ॥१४१॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त दोनों गुणस्थानवर्ती त्रसकायिक और सकायिक पर्याप्त जीवोंका जघन्य अन्तर क्रमशः पल्योपमके असंख्यातवें भाग और अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ १४१॥ उक्कस्सेण वे सागरोवमसहस्साणि पुचकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि, वे सागरोवमसहस्साणि देसूणाणि ॥ १४२ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उपर्युक्त जीवोंका उत्कृष्ट अन्तर क्रमसे पूर्वकोटिपृथक्त्वसे अधिक दो हजार सागरोपम और कुछ कम दो हजार सागरोपम प्रमाण होता है ॥ १४२ ॥ असंजदसम्मादिटिप्पडि जाव अप्पमत्तसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं ॥ १४३ ।। ___ असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्त जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं होता, निरन्तर है । एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ॥ १४४ ।। एक जीवकी अपेक्षा ·उक्त असंयतसम्यग्दृष्टि आदिकोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ १४४ ॥ उक्कस्सेण वे सागरोवमसहस्साणि पुचकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि, वे सागरोवमसहस्साणि देसूणाणि ॥ १४५ ॥ उक्त असंयतादि चारों गुणस्थानवर्ती त्रस और त्रस पर्याप्त जीवोंका उत्कृष्ट अन्तर क्रमशः पूर्वकोटिपृथक्त्वसे अधिक दो हजार सागरोपम और कुछ कम दो हजार सागरोपम होता है ॥१४५॥ चदुण्हमुवसामगाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च ओघं ॥१४६ त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्त चारों उपशामकोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा उनके अन्तरकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १४६ ॥ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ।। १४७ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उनका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ १४७ ॥ उक्कस्सेण वे सागरोवमसहस्साणि पुरकोडि पुंधत्तेणब्भहियाणि, वे सागरोवमसहस्साणि देसूणाणि ॥ १४८ ।। एक जीवकी अपेक्षा त्रसकायिक जीवोंमें उन उपशामकोंका उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्वसे अधिक दो हजार सागरोपम तथा त्रसकायिक पर्याप्तोंमें उन्हींका वह उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो हजार सागरोपम मात्र होता है ॥ १४८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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