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________________ १८] छक्खंडागम ४ योगमार्गणा- प्रदेश-परिस्पन्दरूप आत्माकी प्रवृत्तिके निमित्तसे कर्मोंके ग्रहण करनेमें कारणभूत शक्तिकी उत्पत्तिको योग कहते हैं । अथवा आत्म-प्रदेशोंके संकोच और विस्ताररूप क्रियाको योग कहते हैं। योगके तीन भेद हैं- मनोयोग, वचनयोग और काययोग । वस्तुस्वरूपके विचारके कारणभूत भावमनकी उत्पत्तिके लिए जो आत्म-प्रदेशोंमें परिस्पन्द होता है, उसे मनोयोग कहते हैं। वचनोंकी उत्पत्तिमें जो योग कारण होता है, उसे वचनयोग कहते हैं और कायकी क्रियाकी उत्पत्तिके लिए जो प्रयत्न होता है, उसे काययोग कहते हैं । इन तीनों योगोंमेंसे एकेन्द्रिय जीवोंके केवल एक काययोग पाया जाता है। द्वीन्द्रियसे लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय तकके जीवोंके वचनयोग और काययोग ये दो योग पाये जाते हैं। संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवोंके तीनोंही योग पाये जाते हैं । इस प्रकार इन तीनों योगोंके द्वारा सर्व तेरहवें गुणस्थान तकके सर्व जीवोंको अनुमार्गणा हो जाता है । जो योगोंसे रहित हैं, ऐसे चौदहवें गुणस्थानवर्ती अयोगिकेवली और सिद्ध जीवोंको अयोगी जानना चाहिए। ५ वेदमार्गणा- चारित्रमोहनीयकर्मका भेद जो वेद नोकषायवेदनीय है, उसके उदयसे स्त्री, पुरुष या उभयके विषय सेवनरूप भावोंको वेद कहते हैं। वेदके तीन भेद हैं-- स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद । स्त्रियोंको पुरुषोंके साथ रमनेकी जो इच्छा होती है, उसे स्त्रीवेद कहते हैं। पुरुषोंको स्त्रियोंके साथ रमनेकी अभिलाषाको पुरुषवेद कहते हैं । स्री और पुरुष दोनोंके साथ रमनेकी अभिलाषाको नपुंसकवेद कहते हैं । अथवा उक्त दोनों वेदोंकी अभिलाषारूप प्रवृत्तिसे भिन्न जिस किसीभी प्राणी या उसके अंग-उपांगोंके साथ रमनेके भावको नपुंसकवेद कहते हैं । एकेन्द्रियोंसे लेकर असंज्ञीपंचेंन्द्रियों तकके सर्व जीव नपुंसकवेदीही होते हैं । संज्ञीपंचेन्द्रियोंमें तीनोंवेदी जीव होते हैं। उनमें भी नारकियोंके केवल नपुंसकवेद होता है और देवोंके स्त्री वा पुरुष ये दो वेद होते हैं। मनुष्य और संज्ञीपंचेन्द्रियोंमें तीनों वेदवाले जीव पाये जाते हैं। गुणस्थानोंकी अपेक्षा ये तीनों वेद नववें गुणस्थानके सवेद भाग तक पाये जाते हैं, उससे ऊपरके शेष गुणस्थान वर्ती मनुष्य और सिद्धोंको अवेदी जानना चाहिए । ६ कषायमार्गणा- जो सुख-दुःखको उत्पन्न करनेवाले कर्मरूपी क्षेत्रका कर्षण करे, आत्माके सम्यग्दर्शन, संयमासंयम, सकलसंयम और यथाख्यातचारित्रको न होने दे, उसे कषाय कहते हैं। कषायके चार भेद हैं- क्रोध, मान, माया और लोभ । संसारके क्षुद्रसे क्षुद्र एकेन्द्रिय प्राणीसे लेकर चारों गतियोंके पंचेन्द्रिय प्राणियोंतक सभीके ये चारों कषाय पाई जाती है। यहां तक कि आत्म-विकास करनेवाले जीवोंके भी नववें गुणस्थान तक चारों कषाय पाई जाती हैं । नववें गुणस्थानमें क्रोध, मान, माया कषायका क्षय होता है । लोभकषाय दशवें गुण स्थानतक पाया जाता है, उसके अन्तमें ही लोभ कषायका क्षय होता है। इसके ऊपर कषायोंका अभाव होनेसे ग्यारहवें आदि चार गुणस्थानवी जीवोंको और सिद्धोंको अकषाय अर्थात् कषाय-रहित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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