SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 303
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १७८ ] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [१, ६, २५ नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय मात्र अन्तर होता है ॥ २४ ॥ उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो ॥ २५ ॥ नाना जीवोंकी अपेक्षा नारकियोंमें उक्त दोनों गुणस्थानोंका उत्कृष्ट अन्तर पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र होता है ।। २५ ।। एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो, अंतोमुहुत्तं ॥ २६ ॥ एक जोवकी अपेक्षा नारकियोंमें उक्त दोनों गुणस्थानोंका जघन्य अन्तर क्रमसे पल्योपमका असंख्यातवां भाग और अन्तमुहूर्त मात्र होता है ।। २६ ॥ उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि ॥ २७॥ एक जीवकी अपेक्षा नारकियोंमें सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टियोंका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागरोपम काल मात्र होता है ॥ २७ ॥ पढ मादि जाव सत्तमीए पुढवीए णेरइएसु मिच्छादिद्वि-असंजदसम्मादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, पिरंतरं ॥ २८ ॥ प्रथम पृथिवीसे लेकर सातवीं पृथिवी तकके नारकियोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥२८॥ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहत्तं ॥ २९ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त पृथिवियोंके नारकियोंमें उन दोनों गुणस्थानोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ २९ ॥ उस्कारसेण सागशेवमं तिणि सत्त दस सत्तारस बावीस तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि ॥ ३० ॥ एक जीवकी अपेक्षा इन पृथिवियोंके नारकियोंमें उक्त दोनों गुणस्थानोंका उत्कृष्ट अन्तर क्रमसे कुछ कम एक, तीन, सात, दस, सत्तरह, बावीस और तेतीस सागरोपम मात्र होता है ॥३०॥ सासणसम्मादिद्वि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णण एगसमयं ॥ ३१ ।।। सातों ही पृथिवियोंके सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकियोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यसे वह एक समय मात्र होता है ॥ ३१ ॥ उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो ॥ ३२ ॥ नाना जीवोंकी अपेक्षा उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र होता है। एगजीवं पडुच्च जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो अंतोमुहुत्तं ॥ ३३ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy