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________________ १६८ ] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं एगजीवं पडुच्च जहणेण खुदाभवग्गहणं || ३३५ || एक जीवकी अपेक्षा असंज्ञी जीवोंका जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है ॥ ३३५ ॥ उक्कस्सेण अनंतकालमसंखेज्ज पोग्गलपरियङ्कं ॥ ३३६ ॥ एक जीवकी अपेक्षा असंज्ञियोंका उत्कृष्ट काल अनन्तकालात्मक असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनं प्रमाण है ॥ ३३६ ॥ आहाराणुवादेण आहार एसु मिच्छादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा ॥ ३३७ ॥ आहारमार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं ॥ ३३७ ॥ उस्सप्पिणीओ ।। ३३९ ॥ एगजीवं पडुच्च जहणेण अंतोमुहुत्तं ॥ ३३८ ॥ एक जीवकी अपेक्षा आहारक मिथ्यादृष्टि जीवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ ३३८ ॥ उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जासंखेज्जाओ ओसप्पिणि Jain Education International एक जीवकी अपेक्षा आहारक मिथ्यादृष्टि जीवोंका उत्कृष्ट काल अंगुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी है ॥ ३३९ ॥ सासणसम्मादिट्टि पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति ओघं ॥ ३४० ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर सयोगिकेवली गुणस्थान तक आहारकोंका काल ओके समान है ॥ ३४० ॥ [ १, ५, ३३५. अणाहारएस कम्मइयकायजोगिमंगो || ३४१ ॥ अनाहारक जीवोंका काल कार्मणकाययोगियोंके समान है || ३४१ ॥ अजोगकेवली अघं ॥ ३४२ ॥ अनाहारक अयोगिकेवली जीवोंका काल ओधके समान है ।। ३४२ ॥ ॥ कालानुयोगद्वार समाप्त हुआ || ५ | For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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